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कोर्ट न्यूज: झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, जेलों में संविदा और दैनिक वेतनकर्मियों के नियमितीकरण का आदेश

Thu, 24 Sep 2026 08:54 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची

सार

झारखंड हाईकोर्ट ने जेलों में लंबे समय से कार्यरत संविदा और दैनिक वेतनकर्मियों को राहत देते हुए आठ सप्ताह में नियमितीकरण का आदेश दिया। अदालत ने स्वीकृत पदों पर आउटसोर्सिंग को मनमाना और गैरकानूनी बताते हुए 23 नवंबर 2021 का आदेश रद्द किया।

 

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झारखंड हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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झारखण्ड उच्च न्यायालय ने राज्य की जेलों में संविदा और दैनिक वेतन पर कार्यरत कर्मचारियों को बड़ी राहत प्रदान की है। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने जेलों में लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों के पक्ष में एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह आठ सप्ताह के भीतर इन कर्मचारियों के नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी करे। इसके साथ ही, उच्च न्यायालय ने 23 नवंबर, 2021 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत जेलों में कार्यरत कर्मचारियों की सेवाएं आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से लेने का निर्णय लिया गया था। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्वीकृत पदों पर आउटसोर्सिंग के जरिये की जाने वाली नियुक्तियां पूरी तरह से मनमानी और गैरकानूनी हैं।

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आउटसोर्सिंग के फैसले पर सवाल और अदालत का रुख
उच्च न्यायालय ने कई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए 23 सितंबर 2026 को अपना निर्णय दिया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता लंबे समय से जेलों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और कई कर्मचारी 10 साल से अधिक समय से काम कर रहे हैं। अदालत ने पाया कि 23 नवंबर 2021 को जेल महानिरीक्षक की ओर से आउटसोर्सिंग के जरिये सेवाएं लेने का निर्देश जारी किया गया था। हालांकि रिकॉर्ड में मौजूद 19 दिसंबर 2022 की फाइल नोटिंग से साफ पता चलता है कि प्रशासनिक विभाग ने आउटसोर्सिंग के माध्यम से नियुक्ति को लेकर कोई नीति तय ही नहीं की थी।

अदालत ने कहा कि जब ऐसी कोई नीति बनी ही नहीं थी, तो अधिकारियों का इस तरह का निर्णय लेना तय कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं था। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य को नियमित नियुक्तियों की प्रक्रिया को नजरअंदाज करने के लिए लगातार अनियंत्रित या आउटसोर्स नियुक्तियों का सहारा नहीं लेना चाहिए।
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संवेदनशीलता और प्रशासनिक नियंत्रण का महत्व
उच्च न्यायालय ने जेलों को अत्यधिक संवेदनशील संस्थान बताते हुए कहा कि ऐसे स्थानों पर तैनात कर्मचारियों पर सरकार का पर्याप्त और सीधा नियंत्रण होना बहुत जरूरी है। आउटसोर्सिंग व्यवस्था लागू होने की स्थिति में कर्मचारियों पर सीधा नियंत्रण संबंधित निजी एजेंसी का हो जाएगा। यदि कोई कर्मचारी गंभीर कदाचार या अनियमितता करता है, तो सरकार के सामने नियंत्रण और दंडात्मक कार्रवाई से जुड़ी कई बड़ी कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं। अदालत के अनुसार स्वीकृत पदों पर जेलों में आउटसोर्सिंग के जरिये नियुक्ति करना मनमाना कदम है।

अदालत ने अपने इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के नरेंद्र कुमार तिवारी बनाम झारखंड सरकार मामले में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय का भी प्रमुखता से हवाला दिया। शीर्ष अदालत के सिद्धांतों को आधार बनाते हुए उच्च न्यायालय ने माना कि वर्षों से निरंतर सेवा दे रहे कर्मचारियों के अधिकारों और उनकी वर्तमान स्थिति को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

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नियमितीकरण के लिए आठ सप्ताह का निर्देश
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में 3 मार्च 2021 के राज्य सरकार के प्रस्ताव का विशेष रूप से उल्लेख किया। इस प्रस्ताव के माध्यम से उच्च न्यायालय के पूर्व आदेशों के आधार पर मुख्य रूप से चतुर्थ श्रेणी के 183 कर्मचारियों की सेवाओं को नियमित किया गया था। अदालत ने कहा कि वर्तमान याचिकाकर्ता भी लंबे समय से स्वीकृत पदों पर पूरी निष्ठा से काम कर रहे हैं, इसलिए समान परिस्थितियों में उनके साथ भी एक जैसा व्यवहार होना चाहिए।
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मामले में याचिकाकर्ता लक्ष्मीकांत गुइन की नियुक्ति 19 जून 2013 को तेनुघाट उपजेल में चालक के पद पर दैनिक वेतनभोगी के रूप में हुई थी और उनका पद स्वीकृत एवं स्थायी था। अदालत ने 23 नवंबर 2021 के आदेश को रद्द करते हुए सभी याचिकाकर्ताओं को पहले की तरह संविदा या दैनिक वेतन पर कार्य करते रहने और वेतन पाने का अधिकार दिया। सरकार को आदेश की प्रति मिलने के आठ सप्ताह में नियमितीकरण पूरा करने तथा स्वीकृत पदों पर आउटसोर्सिंग रोकने का आदेश दिया गया।

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