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झारखंड: नियुक्ति का इंतजार खत्म कब? चार साल से खाली पद, विश्वविद्यालयों में बढ़ी प्रशासनिक मुश्किल

Sat, 03 Oct 2026 10:24 AM IST
आशुतोष प्रताप सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची

सार

झारखंड के छह सरकारी विश्वविद्यालयों में करीब चार साल से प्रतिकुलपति के पद खाली होने से शैक्षणिक और प्रशासनिक काम प्रभावित होने की बात सामने आई है। प्रतिकुलपति की अनुपस्थिति में कुलपतियों को डिग्रियों पर हस्ताक्षर समेत कई अहम जिम्मेदारियां संभालनी पड़ रही हैं।
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(प्रतीकात्मक फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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झारखंड के छह सरकारी विश्वविद्यालयों में पिछले करीब चार साल से प्रतिकुलपति के पद खाली हैं। इसका असर विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ रहा है। प्रतिकुलपति नहीं होने के कारण कुलपतियों को स्नातकोत्तर डिग्रियों के साथ स्नातक स्तर की हर साल जारी होने वाली करीब 15 से 30 हजार डिग्रियों पर भी खुद हस्ताक्षर करने पड़ रहे हैं। इससे कई प्रशासनिक फैसलों में देरी हो रही है और उच्च शिक्षा से जुड़े जरूरी काम प्रभावित हो रहे हैं। जिन छह विश्वविद्यालयों में प्रतिकुलपति का पद खाली बताया जा रहा है, उनमें रांची विश्वविद्यालय, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, कोल्हान विश्वविद्यालय, नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय, सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय और बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय शामिल हैं। राज्य के आधिकारिक पोर्टल पर इन विश्वविद्यालयों की मौजूदा कुलपति व्यवस्था दर्ज है।

चार साल पहले शुरू हुई थी नियुक्ति प्रक्रिया

प्रतिकुलपति की नियुक्ति के लिए लोकभवन की ओर से करीब चार साल पहले आवेदन मंगाए गए थे। हालांकि, साढ़े तीन साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी चयन प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। मंगाए गए आवेदनों की स्थिति को लेकर भी कोई स्पष्ट आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। इस देरी का असर सीधे विद्यार्थियों से जुड़े काम पर पड़ रहा है। रांची विश्वविद्यालय में प्रतिकुलपति के हस्ताक्षर नहीं होने के कारण करीब एक लाख डिग्रियां लंबे समय तक लंबित रहने की बात सामने आई। छात्रों के विशेष शुल्क के साथ आवेदन करने पर कुलपति खुद प्रमाणपत्रों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं। इसके बावजूद करीब 80 हजार डिग्रियां अटकी रहीं।

80 हजार डिग्रियों के लिए फेसिमाइल का सहारा

समस्या को देखते हुए पूर्व प्रभारी कुलपति डॉ. डीके सिंह और वर्तमान कुलपति प्रो. सरोज शर्मा ने छात्रहित में डिग्री प्रमाणपत्रों पर फेसिमाइल यानी डिजिटल मुहर लगाने का फैसला किया। परीक्षा विभाग ने अब करीब 80 हजार प्रमाणपत्रों पर फेसिमाइल लगाने के बाद उन्हें संबंधित महाविद्यालयों में भेजना शुरू कर दिया है।

छह विश्वविद्यालयों में ऐसे खाली हुआ पद

इन विश्वविद्यालयों में अंतिम प्रतिकुलपतियों का कार्यकाल खत्म होने के बाद नए अधिकारियों की नियुक्ति नहीं हो सकी। रांची विश्वविद्यालय में डॉ. अरुण कुमार सिन्हा, विनोबा भावे विश्वविद्यालय में डॉ. अजीत कुमार सिन्हा, कोल्हान विश्वविद्यालय में डॉ. कामिनी कुमार, नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय में डॉ. विजय सिंह, सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय में प्रो. बिमल प्रसाद सिंह और बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय में डॉ. पवन कुमार पोद्दार का कार्यकाल समाप्त होने के बाद पद खाली पड़े हैं। प्रतिकुलपति की गैरमौजूदगी में विश्वविद्यालयों में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत वरिष्ठ डीन को जिम्मेदारी देने की बात सामने आई है। प्रतिकुलपति परीक्षा, अकादमिक काउंसिल, सिंडिकेट, वित्तीय प्रबंधन, विभागों और कॉलेजों के बीच समन्वय के साथ खेल गतिविधियों जैसे महत्वपूर्ण कामों में भूमिका निभाते हैं।

नए विश्वविद्यालय अधिनियम में प्रतिकुलपति को अहम जिम्मेदारी

झारखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 2026 में प्रतिकुलपति को कुलपति के बाद विश्वविद्यालय का प्रमुख शैक्षणिक और प्रशासनिक अधिकारी बनाया गया है। अधिनियम के अनुसार प्रतिकुलपति पूरे विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और प्रशासनिक कामकाज की जिम्मेदारी संभालते हैं। उन्हें स्टडी सेंटर और रीजनल सेंटर बोर्ड का अध्यक्ष भी बनाया गया है। अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि कुलपति या अंतरिम कुलपति की अनुपस्थिति में प्रतिकुलपति संबंधित प्राधिकरणों, बोर्ड और समितियों की अध्यक्षता कर सकते हैं। इसके अलावा प्रतिकुलपति का पद खाली होने पर राज्यपाल, मुख्यमंत्री से परामर्श करके योग्य व्यक्ति को अस्थायी रूप से इस पद की जिम्मेदारी दे सकते हैं। यह व्यवस्था नियमित नियुक्ति होने तक लागू रह सकती है।

सर्च कमेटी की सिफारिश से होगी नियमित नियुक्ति

नए अधिनियम के मुताबिक प्रतिकुलपति का चयन सर्च कमेटी की ओर से सुझाए गए नामों में से राज्यपाल और मुख्यमंत्री संयुक्त रूप से करेंगे। इसके बाद राज्यपाल प्रतिकुलपति की नियुक्ति करेंगे। पद की अवधि तीन साल तय की गई है। ऐसे में लंबे समय से खाली पड़े प्रतिकुलपति के पदों को भरना विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक कामकाज के साथ छात्रों से जुड़े प्रमाणपत्र और परीक्षा संबंधी कार्यों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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