झारखंड उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने पूर्वी सिंहभूम जिले के पटमदा थाना क्षेत्र में हुए चर्चित सामूहिक दुष्कर्म मामले में निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह से बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति आनंद सेन और न्यायमूर्ति पीके श्रीवास्तव की पीठ ने चारों दोषियों की याचिकाएं खारिज करते हुए उन्हें दी गई 20-20 साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा को सही ठहराया है। उच्च न्यायालय ने अपने इस अहम फैसले में स्पष्ट किया कि केवल चिकित्सीय जांच में शुक्राणु न मिलने या मेडिकल रिपोर्ट की तकनीकी कमियों के आधार पर पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।
मेडिकल रिपोर्ट से ऊपर पीड़िता का बयान
उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पीड़िता का बयान पूरी तरह से भरोसेमंद और निष्पक्ष है। महिला के शरीर और पीठ पर मिले चोट तथा खरोंच के निशान इस वीभत्स घटना की सत्यता को पूरी तरह प्रमाणित करते हैं। अदालत ने उच्चतम न्यायालय के पूर्व के आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे संगीन मामलों में पीड़िता का निष्पक्ष और ठोस बयान ही दोषियों को सजा सुनाने के लिए पर्याप्त आधार है।
अदालत ने प्राथमिकी दर्ज कराने में हुए तीन दिन के विलंब पर भी स्थिति पूरी तरह साफ कर दी। पीठ ने माना कि ग्रामीण परिवेश में रहने के कारण पीड़िता के परिजनों ने पहले सामाजिक स्तर पर पंचायत के माध्यम से न्याय पाने का प्रयास किया था। जब आरोपियों के भागने के कारण पंचायत में बात नहीं बन सकी, तब जाकर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई गई। ऐसी परिस्थिति में प्राथमिकी में तीन दिन का विलंब होना पूरी तरह से स्वाभाविक है और इससे अभियोजन के पक्ष पर कोई असर नहीं पड़ता।
जंगल में दिया था वारदात को अंजाम
अभियोजन पक्ष के अनुसार यह दुखद घटना 5 नवंबर, 2013 की है। पीड़िता उस दिन दोपहर में अपनी ससुराल से मायके जाने के लिए निकली थी। दोपहर करीब तीन बजे जब वह लपित छेंचा जंगल के पास पहुंची, तभी जेरका गांव निवासी हेमंत सिंह, रामनाथ सिंह, विभीषण सिंह और फागु हांसदा ने उसे जबरन दबोच लिया। इसके बाद चारों आरोपी उसे खींचकर घने जंगल के भीतर ले गए और बारी-बारी से उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।
इसी दौरान जंगल में किसी की आहट सुनकर चारों आरोपी पीड़िता को वहीं छोड़कर मौके से भाग निकले। घटना के बाद पीड़ित महिला ने परिजनों को आपबीती सुनाई। स्थानीय स्तर पर गांव में पंचायत बैठाकर मामले को सुलझाने की कोशिश हुई, लेकिन आरोपी गांव से भाग खड़े हुए। अंततः घटना के तीन दिन बाद, 8 नवंबर 2013 को पटमदा थाने में चारों आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई।
निचली अदालत का फैसला और आत्मसमर्पण का आदेश
जमशेदपुर की त्वरित अदालत ने इस मामले में सुनवाई करते हुए 23 अगस्त, 2018 को चारों अभियुक्तों को दोषी करार दिया था। इसके बाद 29 अगस्त 2018 को प्रत्येक दोषी को 20-20 साल के कठोर कारावास और 40-40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। निचली अदालत के इस फैसले को दोषियों ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
उच्च न्यायालय ने अब निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए दोषी हेमंत सिंह को जेल में ही रहने का निर्देश दिया है। वहीं, मामले के तीन अन्य दोषियों रामनाथ सिंह, विभीषण सिंह और फागु हांसदा को दो महीने के भीतर अदालत में आत्मसमर्पण करने का सख्त आदेश दिया है। यदि वे निर्धारित समय में आत्मसमर्पण नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।