झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के प्रावधानों को चुनौती देने और विशेष अदालत में मुकदमे की प्रक्रिया रोकने की मांग करने वाली हेमंत सोरेन की याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान केंद्र सरकार की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। उच्च न्यायालय ने इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख 19 नवंबर निर्धारित की है।
केंद्र सरकार से मांगा जवाब
उच्च न्यायालय में बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष प्रस्तुत करने के लिए समय की मांग की गई। केंद्र सरकार ने बताया कि वह इस संबंध में अपना विस्तृत जवाब तैयार कर दाखिल करेगी। पीठ ने इस आग्रह को स्वीकार करते हुए सुनवाई स्थगित कर दी। हेमंत सोरेन ने अपनी याचिका के माध्यम से पीएमएलए कानून की धारा 44 (1) (2) को चुनौती दी है। चूंकि यह कानून केंद्र सरकार द्वारा निर्मित है, इसलिए पिछली सुनवाई के समय अदालत ने केंद्र सरकार को मामले में प्रतिवादी बनाते हुए अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था।
जांच और ट्रायल पर तर्क
हेमंत सोरेन के पक्ष ने अदालत में यह तर्क रखा कि जब जांच एजेंसी ईडी ने जांच पूर्ण मानकर विशेष अदालत के समक्ष अभियोजन शिकायत यानी आरोप पत्र दाखिल कर दिया है, तो इसके बाद आगे की जांच निरंतर जारी नहीं रखी जा सकती। वहीं, ईडी की ओर से दायर आरोप पत्र में यह उल्लेख किया गया है कि मामले में जांच अभी जारी है। सोरेन की ओर से कहा गया कि जब तक उच्च न्यायालय में इस याचिका पर अंतिम सुनवाई लंबित है, तब तक ईडी अदालत में मुकदमे (ट्रायल) की कार्रवाई को आगे बढ़ाने पर रोक लगाई जाए। हालांकि, अदालत ने मुकदमे की कार्रवाई रोकने को लेकर कोई आदेश जारी नहीं किया है।
जमीन फर्जीवाड़े का मामला
यह पूरा मामला राजधानी रांची के बरियातू स्थित बड़गाईं अंचल की 8.86 एकड़ जमीन पर अवैध रूप से कब्जा करने और उससे जुड़े फर्जीवाड़े से संबंधित है। इस मामले में जांच एजेंसी ईडी ने हेमंत सोरेन को आरोपी बनाया है। इससे पहले 30 सितंबर को ईडी की विशेष अदालत ने हेमंत सोरेन पर औपचारिक रूप से आरोप तय किए थे। विशेष अदालत ने ईडी को निर्देश दिया था कि वह 30 नवंबर से इस मामले में अपने गवाहों को प्रस्तुत कर उनके बयान दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू करे। हेमंत सोरेन ने विशेष अदालत के इस निर्देश और आरोप तय करने के आदेश को भी उच्च न्यायालय में चुनौती दी है।