पूर्व कांग्रेस विधायक अम्बा प्रसाद ने रांची में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर झारखंड की पुलिसिंग और अभियोजन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने बताया कि 1 जुलाई 2024 से दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लागू हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद 2026 में भी झारखंड में दर्ज हो रही एफआईआर में CrPC की धाराएं लिखी जा रही हैं।
पूर्व कांग्रेस विधायक अम्बा प्रसाद ने शनिवार को झारखंड न्यायिक अकादमी, रांची के बाहर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य की पुलिसिंग, अभियोजन व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि वह मुख्यमंत्री सह गृह मंत्री, झारखंड के नागरिकों, देशवासियों तथा सर्वोच्च न्यायालय और झारखंड उच्च न्यायालय के संज्ञान में एक अत्यंत गंभीर संवैधानिक और कानूनी विसंगति लाना चाहती हैं।
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CrPC की जगह BNSS लागू
अम्बा प्रसाद ने बताया कि झारखंड के पुलिस थानों में प्रतिदिन दर्ज हो रही हजारों प्राथमिकी में अब भी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 154 का उल्लेख किया जा रहा है, जबकि ये सभी मामले हालिया समय के हैं। उन्होंने इसे तकनीकी चूक मानने से इनकार करते हुए कहा कि यह कानून के खुले उल्लंघन का मामला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 1 जुलाई 2024 से देश में दंड प्रक्रिया संहिता को समाप्त कर उसकी जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लागू हो चुकी है। इसके बावजूद वर्ष 2026 में भी झारखंड में NCRB के ऑनलाइन सिस्टम पर दर्ज हो रही प्राथमिकी में CrPC की धाराएं दिखाई जा रही हैं, जबकि विधिक रूप से अब प्राथमिकी BNSS की धारा 173 के तहत दर्ज की जानी चाहिए।
मृत कानून को दस्तावेजों में चलाने का आरोप
पूर्व विधायक ने इस स्थिति को “मृत कानून” को सरकारी दस्तावेजों में चलाने जैसा बताते हुए कहा कि यह राज्य की कानून व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। उन्होंने हैरानी जताई कि न तो प्रशासन, न अभियोजन विभाग और न ही राजनीतिक नेतृत्व ने अब तक इस गंभीर त्रुटि को सुधारने की पहल की है। यहां तक कि विधानसभा में भी इस मुद्दे पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया।
कानूनी शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल
अम्बा प्रसाद ने कहा कि यह मामला इसलिए और भी चिंताजनक है क्योंकि राज्य में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, न्यायिक अकादमी और कई विधि महाविद्यालय संचालित हैं। इसके बावजूद भावी वकीलों और न्यायाधीशों को आज भी गलत कानूनी प्रावधानों के आधार पर प्राथमिकी की प्रक्रिया पढ़ाई जा रही है, जो न्याय प्रणाली के साथ मज़ाक है। उन्होंने मांग की कि इस गंभीर कानूनी विसंगति को अविलंब दुरुस्त किया जाए और राज्य सरकार तत्काल संज्ञान लेकर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करे।