झारखंड के खूंटी जिले में दुर्गापूजा का पर्व आस्था, परंपरा और बंगाली संस्कृति के अनूठे संगम के रूप में मनाया जाता है। यहां स्थित हरि मंदिर में वर्ष 1943 में शुरू हुई दुर्गापूजा अब अपने 83वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। आठ दशक से अधिक पुरानी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ निभाई जा रही है। अष्टमी के दिन होने वाला धुनुची नृत्य और विजयादशमी पर आयोजित सिंदूर खेला इस दुर्गोत्सव के प्रमुख आकर्षण हैं। इन परंपराओं के माध्यम से बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिलती है।
खूंटी जिले में 70 से अधिक स्थानों पर दुर्गापूजा का आयोजन किया जाता है, लेकिन हरि मंदिर की पूजा अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण अलग पहचान रखती है। इस मंदिर की स्थापना तामल कृष्ण दास, कृष्णचंद्र दास और खुदुराम दास ने अपनी माता हरिमति देवी की स्मृति में की थी। तीनों सगे भाइयों ने मंदिर की स्थापना के साथ ही मां दुर्गा की आराधना की परंपरा शुरू की थी, जो आज भी निरंतर जारी है।
बंगाल से बुलाए जाते हैं पुरोहित, पारंपरिक विधि से होती है पूजा
हरि मंदिर में आयोजित दुर्गापूजा में बंगाली रीति-रिवाजों का विशेष महत्व है। पूजा संपन्न कराने के लिए बंगाल से पुरोहितों को बुलाया जाता है। कलश स्थापना के साथ शुरू होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में बेलबरण पूजा सहित विभिन्न विधियां पारंपरिक तरीके से संपन्न कराई जाती हैं।
इस दुर्गोत्सव की एक खास बात यह भी है कि पूजा का पूरा खर्च संस्थापक परिवार की ओर से वहन किया जाता है। परिवार के सदस्य देश के अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं, लेकिन दुर्गोत्सव के अवसर पर सभी खूंटी पहुंचकर मां दुर्गा की आराधना में शामिल होते हैं। इस तरह परिवार की कई पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा आज भी कायम है।
अष्टमी पर धुनुची नृत्य, दशमी को सिंदूर खेला
हरि मंदिर के दुर्गोत्सव में अष्टमी और विजयादशमी के अनुष्ठानों का विशेष आकर्षण रहता है। अष्टमी के दिन श्रद्धालु धुनुची नृत्य के माध्यम से मां दुर्गा के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करते हैं। पारंपरिक बंगाली संस्कृति से जुड़ा यह नृत्य दुर्गापूजा के उत्सव को खास बनाता है।
वहीं, विजयादशमी के दिन सिंदूर खेला की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान महिलाएं सबसे पहले मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। मां दुर्गा को विदाई देने से जुड़ी यह परंपरा भावनात्मक और सांस्कृतिक, दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
नवमी को खिचड़ी और खीर का प्रसाद, दशमी को विसर्जन
हरि मंदिर में दुर्गोत्सव के दौरान प्रसाद वितरण की भी विशेष परंपरा है। नवमी के दिन दोपहर में श्रद्धालुओं के बीच खिचड़ी और शाम को खीर का प्रसाद वितरित किया जाता है। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। दशमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन के साथ दुर्गोत्सव का समापन होता है। वर्ष 1943 से चली आ रही हरि मंदिर की यह ऐतिहासिक परंपरा आज भी खूंटी में बंगाली संस्कृति, धार्मिक आस्था और सामाजिक एकजुटता की मिसाल बनी हुई है। आठ दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यहां दुर्गापूजा का पारंपरिक स्वरूप कायम है, जो नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का काम कर रहा है।