वह एक महीना पहले राष्ट्रमंडल लघुकथा पुरस्कार के क्षेत्रीय वर्ग में एशिया का खिताब जीतकर बहुत खुश थी, लेकिन उसका और उसकी कलम का संघर्ष कुछ बेहतर का हकदार था। रांची की 29 वर्षीय कृतिका पांडे की एक छोटी सी कहानी ने उसे लोकल से ग्लोबल बना दिया। इंजीनियरिंग छोड़कर कलम थामने के उसके फैसले को सही साबित कर दिया।
रांची के किसी मध्यम वर्गीय परिवार में पैदा होने वाली लड़कियों को एक उम्र के बाद अपने माता-पिता की बात मानकर शादी कर लेनी चाहिए। मगर वह ऐसा नहीं कर पाईं और उन्हें एक अर्से तक इस बात का मलाल रहा कि वह एक ‘अच्छी बेटी’ नहीं हैं, लेकिन यह पुरस्कार मिलने के बाद उन्हें अपने फैसले पर अब कोई मलाल नहीं है। उनकी पुरस्कार विजेता कहानी को अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिका ‘ग्रांटा’ में प्रकाशित किया जाएगा।
रांची के लोरेटो कॉन्वेंट स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद एसडी जैन मॉडर्न स्कूल और डीपीएस रांची से पढ़ाई करने के बाद कृतिका ने परिवार के दबाव में मेसरा के बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की। उनका कहना है कि स्कूल में टॉप करने के बाद वह अपने पिता को समझा ही नहीं पाईं कि वह साहित्य के क्षेत्र में कुछ करना चाहती हैं। उस समय उनके पास परिवार की बात मान लेने के अलावा कोई चारा भी नहीं था, लेकिन उसके बाद उनके पंख खुलने लगे और उनकी कलम की उड़ान उन्हें सात समंदर पार ले गई।