झारखंड हाईकोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए चार आरोपियों की अपीलों को खारिज करते हुए उनकी 20 साल की कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी है। अदालत ने पीड़िता की गवाही को पूरी तरह विश्वसनीय माना और स्पष्ट किया कि प्राथमिकी दर्ज कराने में तीन दिन की देरी, शुरुआत में आरोपियों के नाम न जान पाना तथा मेडिकल जांच में वीर्य न मिलना गवाही को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने कहा कि घटना के 72 घंटे बाद मेडिकल जांच में वीर्य न मिलना स्वाभाविक है, जबकि पीड़िता के शरीर पर मिले चोटों के निशान घटना की पुष्टि करने वाले महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं।
ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट की मंजूरी
हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने दोषियों द्वारा दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। यह अपीलें जमशेदपुर सिविल कोर्ट के फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा 23 अगस्त 2018 को सुनाए गए दोषसिद्धि के फैसले और 29 अगस्त 2018 के सजा के आदेश के खिलाफ दाखिल की गई थीं। ट्रायल कोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म के इस मामले में सभी दोषियों को 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही अदालत ने सभी दोषियों पर 40 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सभी साक्ष्यों की समीक्षा करने के बाद पाया कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी तरह की कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं है। इसके बाद अदालत ने निचली अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए सजा को यथावत रखा।
जंगल के पास वर्ष 2013 की घटना
मामले के अभियोजन पक्ष के अनुसार यह वारदात 5 नवंबर 2013 की है। पीड़िता उस दिन अपने ससुराल से मायके जा रही थी। रास्ते में लापिट छेंचा जंगल के समीप एपीओ टोला-जेर्का-अमदा पहाड़ी के पास चार आरोपियों ने उसे अचानक घेर लिया। इसके बाद आरोपी उसे जबरन एक नाले की ओर ले गए और वहां बारी-बारी से उसके साथ दुष्कर्म किया। वारदात के दौरान आरोपियों ने पीड़िता का मुंह दबाए रखा और शोर मचाने पर उसे पानी में डुबोकर जान से मारने की धमकी दी।
इसी बीच आसपास के इलाके में कुछ लोगों की आहट सुनकर आरोपी घबरा गए और पीड़िता को छोड़कर मौके से भाग निकले। घटना के बाद पीड़िता को प्रकाश हेम्ब्रम के घर ले जाया गया, जहां उसने किसी तरह रात बिताई। अगले दिन गांव में इस घटना को लेकर एक पंचायत बुलाई गई, लेकिन आरोपी पंचायत में शामिल नहीं हुए। इसके बाद पीड़िता ने 8 नवंबर 2013 को थाने पहुंचकर प्राथमिकी दर्ज कराई।
मेडिकल साक्ष्य और चोट के निशान बने आधार
हाईकोर्ट ने प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई तीन दिन की देरी के कारण पर विचार करते हुए इसे पूरी तरह तर्कसंगत माना। अदालत ने कहा कि पीड़िता एक अशिक्षित विधवा महिला है और उसके गांव में पुलिस के पास जाने से पहले पंचायत बुलाने की सामाजिक परंपरा रही है। पीड़िता को आरोपियों के नाम भी पहली बार गांव की पंचायत के दौरान ही पता चले थे, लेकिन उसने अदालत के समक्ष सभी आरोपियों की पहचान उनके चेहरों से सफलतापूर्वक की थी।
अदालत ने पीड़िता के शरीर पर मिले जख्मों को गंभीर साक्ष्य माना। चिकित्सीय जांच रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता की पीठ, स्तन, कलाई और पैरों पर चोट के निशान मिले थे, जो उसके साथ हुई हिंसा की स्पष्ट पुष्टि करते हैं। घटना के 72 घंटे बाद वीर्य न मिलने के बिंदु पर अदालत ने कहा कि इतने समय के अंतराल और पीड़िता की लगभग 50 वर्ष की आयु को देखते हुए वीर्य का न मिलना अस्वाभाविक नहीं है। दोषियों की ओर से खुद को झूठा फंसाने की दलील के समर्थन में कोई मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया था।