फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

झारखंड हाईकोर्ट का फैसला: दूरस्थ शिक्षा की बी. टेक डिग्री पर प्रमोशन अमान्य, डिप्टी जीएम की बहाली का आदेश रद्द

Fri, 25 Sep 2026 10:12 PM IST
प्रतीक पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची

सार

झारखंड हाईकोर्ट ने एनएचएआई कर्मचारी को डिप्टी जीएम पद पर बहाल करने वाले कैट के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने दूरस्थ शिक्षा से हासिल बीटेक डिग्री को पदोन्नति के लिए मान्य नहीं माना और एनएचएआई के पदावनति आदेश को बरकरार रखा।
विज्ञापन
झारखंड उच्च न्यायालय - फोटो : Social Media
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

झारखंड उच्च न्यायालय ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की याचिका स्वीकार करते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक कर्मचारी को उप महाप्रबंधक (तकनीकी) के पद पर बहाल करने का निर्देश दिया गया था।
विज्ञापन


मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने एनएचएआई के 27 जून 2024 के पदावनति आदेश को सही ठहराते हुए कर्मचारी को मूल पद पर बनाए रखने का फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दूरस्थ शिक्षा से हासिल की गई जिस बीटेक डिग्री के आधार पर कर्मचारी को पदोन्नति मिली थी, उसे सर्वोच्च न्यायालय पहले ही अमान्य घोषित कर चुका है। ऐसी स्थिति में उस डिग्री के बल पर पदोन्नति या करियर का लाभ जारी नहीं रह सकता।

दूरस्थ शिक्षा से तकनीकी डिग्रियों को निरस्त कर चुका है सर्वोच्च न्यायालय
मामले की सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2018 में आए ऐतिहासिक निर्णय का संदर्भ दिया। ओडिशा लिफ्ट इरिगेशन कॉरपोरेशन बनाम रबी शंकर पात्रो मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2001-2005 के बाद दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से प्राप्त तकनीकी डिग्रियों को निरस्त कर दिया था। शीर्ष अदालत ने  आदेश में स्पष्ट कहा था कि ऐसी डिग्रियों के आधार पर मिले सभी पदोन्नति और कॅरिअर संबंधी लाभ वापस लिए जाएंगे, हालांकि पूर्व में भुगतान किया गया वेतन वसूला नहीं जाएगा। उच्च न्यायालय ने कहा कि प्राधिकरण के 1996 भर्ती नियमों और वर्ष 2011 के विज्ञापन के अनुसार प्रबंधक (तकनीकी) पद के लिए सिविल इंजीनियरिंग की मान्यता प्राप्त डिग्री अनिवार्य थी। अदालत ने टिप्पणी की कि लंबा अनुभव किसी भी अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता का विकल्प नहीं बन सकता और अदालतें सहानुभूति के आधार पर भर्ती नियमों को परिवर्तित नहीं कर सकतीं।
विज्ञापन


ड्राफ्ट्समैन के रूप में हुई थी नियुक्ति
संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति वर्ष 1997 में एनएचएआई में ड्राफ्ट्समैन के रूप में हुई थी, जिसे बाद में तकनीकी सहायक का पदनाम प्रदान किया गया। सेवा अवधि के दौरान कर्मचारी ने जनार्दन राय नगर राजस्थान विद्यापीठ से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से बीटेक की डिग्री प्राप्त की। इस डिग्री के आधार पर वर्ष 2011 में जारी विज्ञापन के तहत उन्होंने प्रबंधक (तकनीकी) पद के लिए आवेदन किया। वर्ष 2015 में कर्मचारी को इस पद पर नियुक्ति मिली और बाद में उन्हें उप महाप्रबंधक (तकनीकी) पद पर पदोन्नति दे दी गई। सर्वोच्च न्यायालय के 2018 वाले फैसले के आलोक में एनएचएआई ने वर्ष 2021 में कार्रवाई करते हुए कर्मचारी को पुनः उनके मूल पद यानी तकनीकी सहायक के रूप में वापस भेज दिया था।

उच्च न्यायालय के आदेश की गलत व्याख्या की
पदावनति के इस निर्णय को कर्मचारी ने पहले उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। वर्ष 2022 में उच्च न्यायालय ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन न होने के कारण आदेश निरस्त कर दिया था और एनएचएआई को कारण बताओ नोटिस देकर पुनः निर्णय लेने का निर्देश दिया था। इसके पश्चात, प्राधिकरण ने कर्मचारी को पक्ष रखने का अवसर दिया और 27 जून, 2024 को फिर से पदावनति का आदेश जारी किया। इस आदेश के खिलाफ कर्मचारी कैट पहुंचे, जहां रांची सर्किट बेंच ने 6 फरवरी, 2025 को कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें उप महाप्रबंधक पद पर बहाल करने का निर्देश दे दिया। एनएचएआई ने कैट के इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। खंडपीठ ने कहा कि कैट ने वर्ष 2022 के उच्च न्यायालय के आदेश की गलत व्याख्या की, क्योंकि तब अदालत ने केवल प्रक्रियात्मक न्याय की बात कही थी, डिग्री की अनिवार्यता पर कोई छूट नहीं दी थी। उच्च न्यायालय ने कैट का 6 फरवरी, 2025 का आदेश रद्द कर दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें