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खेतों में काम कर रहा कारगिल की लड़ाई लड़ने वाला कर्नल

Fri, 28 Oct 2016 07:16 AM IST
नीरज सिन्हा, हजारीबाग से लौटकर/बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
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- फोटो : bbc
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करगिल की लड़ाई लड़ चुके कर्नल विनय कुमार अब झारखंड में पहाड़ों पर बसे आदिवासी गांवों में झरने के पानी को ऊर्जा पंप के सहारे खेतों तक पहुंचाने में लगे हुए हैं। ख़ास तरीके से बनाए गए इस ऊर्जा पंप को उन्होंने अमरीका के दौरे के दौरान यूट्यूब पर देखा था। 
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वो बताते हैं कि इसे देखकर मुझे उसी वक़्त लगा था कि झारखंड के पठारी इलाकों में पानी संकट के बीच ये कारगर साबित होगा, फिर साल भर इस प्रोजेक्ट पर काम किया और सफलता पाई।

वो बताते हैं कि जब हजारीबाग के कोतीटोला गांव में नीचे से झरने के पानी को ऊपर पहुंचाया तो गांववालों की खुशियां देखकर लगा कि गांव लौटने का सपना जरूर साकार होगा। लेकिन इस दौरान जब सरकारी तंत्र से सामना हुआ तो ऊपर से नीचे तक यही कहा गया कि सिस्टम के साथ काम कीजिए, यह हमसे नहीं हो सका।
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कर्नल विनय श्रीलंका में भारतीय शांति सेना और बटालिक में ऑपरेशन विजय का हिस्सा रह चुके हैं। वो हजारीबाग के बभनवे गांव के मूल निवासी हैं, सेना से रिटायर होने के बाद वो गांव लौट आए जबकि उनके सभी बच्चे बाहर रहते हैं।

सरकार का काम रिटायर्ड कर्नल के कंधों पर

- फोटो : bbc
गांव लौटने का उनका मकसद था कि यहां रहकर गरीबों की मदद की जाए। सिस्टम की परवाह ना करते हुए उन्होंने ऊर्जा पंप लगाने में सफलता पाई, इसे उन्होंने प्रकृति जल ऊर्जा पंप' का नाम दिया है। इस तकनीक के जरिए झरने, छोटे जल प्रपात का पानी, बिना बिजली, डीजल केरोसिन के पाइप के सहारे पहाड़ों, गांवों और आसपास के जंगलों में पहुंचाया जा सकता है।

राज्य में दस जगहों पर किसान खुशहाली योजना के तहत उन्होंने यह काम किया, फिर रफ्तार थम गई। वे कहते हैं कि बिना सरकारी तंत्र की मदद ये काम कैसे आगे बढ़ सकता था।

सिस्टम से होने वाली परेशानी के बारे में वो बताते हैं कि सरकारी महकमे में हमे ठेकेदार, सप्लायर की नज़रों से देखा जाने लगा, जबकि हम ठहरे इनोवेटर, कृषि वैज्ञानिक, इंजिनयर और सालों तक देश की सेवा करने वाले फ़ौज के अधिकारी।

उन्होंने बताया कि साल भर इस प्रोजेक्ट पर काम करने के बाद उन्हें सफलता मिली। वे बताते हैं कि छह इंच के ऊर्जा पंप के जरिए पंद्रह से बीस एकड़ जमीन की पटवन सालों भर आसानी से हो सकती है और इसे लगाने में दस लाख खर्च हो सकते हैं।

कर्नल की ‌जिद ने बदल दी ग्रामीणों की जिंदगी

- फोटो : bbc
गांव के सुंदर उरांव कहते हैं अपनी जिद पर अड़े कर्नल साहब को हमलोगों ने करीब से देखा है, वे पैसे लेने और देने के लिए काम नहीं कर सकते। इनका गंवई भाषा में बतियाना, पहाड़ों पर ग्रामीणों के साथ रहना, खाना और खाट पर ही सोना सबों को भाता है। कोई सरकारी बाबू या अफसर ये सोच भी नहीं सकता।

देश के अलग-अलग हिस्सों से किसान और कृषि सुधार की दिशा में काम करने वाली संस्थाएं इस प्रोजेक्ट को लेकर कर्नल विनय कुमार से संपर्क करते रहे हैं। ओडिशा में उन्होंने चार प्रोजेक्ट पर काम किए हैं।

ओडिशा की तस्वीरों और प्रशंसा पत्रों को सिलसिलेवार ढंग से दिखाते हुए वे कहते हैं कि देखिए कैसे जूझना पड़ता है। हजारीबाग के एक सुदूर गांव के राजू राम खेतों में प्रकृति पंप के जरिए बहते पानी को दिखाते हुए कहते हैं यह योजना अद्भुत है, लेकिन इसे लगाने को पैसे की मदद कौन करे।

हालांकि किसान, पानी संकट और वैज्ञानिक तथा जैविक आधार पर खेती के गुर जानने को लेकर जब भी इस शख़्स को बुलाते हैं, वे दौड़े जाते हैं। तब इन्हें न वक़्त का ख्याल रहता है और ना ही किसी परेशानी का।

जमुनिया देवी कहती हैं, "हम गांव वाले तो इतना ही जानते हैं कि ढिबरी और लालटेन जलाने के लिए भी साधन नहीं है और ये तो बिना तेल और बिजली के पानी दौड़ाते हैं।"
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बच्चे बाहर, खुद पत्नी के साथ गांव में लोगों की सेवा करते हैं कर्नल

- फोटो : bbc
इन दिनों कर्नल विनय रोटरी फाउंडेशन से जुड़कर आंखों की अस्पताल चला रहे हैं, इसके अलावा उन्होंने गांव की लड़कियों- महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए खाली पड़े अपने पुश्तैनी मकान में सिलाई प्रशिक्षण सेंटर खुलावाया है।

रानू देवी कहती हैं कि गांवों की लड़कियां अब रोजगार से जुड़ रही हैं, हमें मदद की दरकार है, पर करें क्या। कई गांवों का हाल जानने के बाद हम अस्पताल पहुंचे तो देखा कि फाउंडेशन के शैलेश लाल, सुखदेव नायर, विनय कुमार और उनकी पत्नी सरोज, विनोभा भावे हजारीबाग विश्वविद्यालय के प्राध्यापक सुबोध सिंह शिवगीत दूरदराज गांवों के मरीजों की सेवा में जुटे हैं। इन मरीजों की आंखों का ऑपरेशन किया गया था।

कदमा गांव की पार्वती पंडिताइन कहती हैं, "गांव- गांव घूमकर पूछना कि चाची आंख में रौशनी है कि नहीं, फिर टेंपो में बैठाकार अस्पताल लाना कौन कर सकता है।"

सुबोध सिंह कहते हैं कि वाकई फ़ौज का ये अधिकारी और उनकी पत्नी दूसरों के सुख में अपना सुख तलाशते हैं, तभी तो ये मरीजों के लिए खाना पकाते हैं, बिछावन धोते हैं, हमें इसका दर्द हैं कि सिंचाई, स्वास्थ्य, के क्षेत्र में पिछले पायदान पर खड़े झारखंड में तर्जुबे का कद्र नहीं।

अस्पताल की चादरें धोने के सवाल पर कर्नल विनय की पत्नी सरोज कहती हैं, "हां इसमें हर्ज क्या है, अड़चनों के बीच हमें इन कामों से सुकून मिलता है। दरअसल रिटायर होने से पांच साल पहले हम दोनों ने तय कर लिया था महानगरों में बसने के बजाय लौट जाएंगे गांव और गांववालों के लिए जियेंगे, तभी तो हम अच्छी अंग्रेजी भी बोलते हैं और गांव की भाषा भी।"
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