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जिंदगी के कैनवास में कैसे भरें रंग, अब दीदी नहीं आतीं...

Tue, 03 Jun 2014 12:17 PM IST
नीरज सिन्हा/रांची से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
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लडखडाते हुए ही सही, वे बिस्तर से उठकर चलने लगे थे। थरथराते-तुतलाते ही सही वे दो और दो चार बताने लगे थे। हाथ नहीं पर वो पेंसिल और रंग पकड गंवई और मुफलिसी भरी जिंदगी के कैनवास में रंग भरने लगे थे। उनके होठों पर मुस्कान छाने लगी थी।
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लेकिन अब ये सब कुछ थम सा गया लगता है। उनकी आंखे शून्य को निहारती हैं। दरअसल अब उनकी दीदी आती नहीं। आती भी हैं, तो अपनी मायूसी लेकर। मिले और पल भर में चल दिए। ये कहानी है झारखंड के गांवों-कस्बों में, झुग्गी झोपडियों में रहने वाले विकलांग बच्चों की।

समावेशी शिक्षा अभियान के तहत सरकार की गृह आधारित शिक्षा योजना में उन्हें शामिल किया गया था।

लेकिन यह योजना रोक दिए जाने से राज्य भर में आठ हजार से अधिक विकलांग बच्चों का भविष्य मुश्किलों में पड गया है।

इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन के लिए तीन हजार के मानदेय पर पूरे राज्य में 1100 से अधिक केयर गिवर नियुक्त किए गए थे।

ये लोग विकलांग बच्चों को दिनचर्या व साफ-सफाई के बारे में बताने के साथ उन्हें प्रारंभिक शिक्षा देने, उनकी मनःस्थिति व परिस्थितियों के अनुरूप स्कूलों में नामांकन कराने, खेलकूद प्रतियोगिता में भाग दिलाने व प्रोत्साहन राशि दिलाने में सक्रिय भूमिका अदा करते थे।
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इनके अलावा घर वालों को भी बच्चों की देखरेख के लिए समझाते थे। इसके लिए लाखों खर्च कर उन्हें प्रशिक्षण भी दिया गया था।

योजना रोकने का असर
केयर गिवर अपर्णा बाडा सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। हमारी बातचीत अभी शुरू ही हुई थी कि उन्होंने कहा कि इस योजना को रोके जाने का क्या असर पडा है इसे जानने के लिए आपको पैदल ही गांवों के टोले, गलियों में चलना होगा। वो बताती हैं कि इस कार्यक्रम के संचालन में पुरुष और महिलाएं दोनों जुडे हैं। लेकिन अधिकतर विकलांग बच्चों के बीच महिलाएं दीदी के नाम से जानी जाती हैं।

बहरहाल हम उनके साथ पैदल ही गांवों की ओर बढे। रास्ते में वो बता रही थीं कि केयर गिवरों का काम छूटा, तीन हजार का मानदेय मिलना बंद हुआ इसके अपने दर्द हैं, लेकिन उनका दिल इसलिए कचोटता है कि अब ग्रामीण विकलांग बच्चों का क्या होगा!

कई मजबूरियों की वजह से गांव के लोग एसे बच्चों को ठीक से देख-संभाल नहीं पाते। वो बताती हैं कि तीन साल पहले यह योजना शुरू हुई थी और इस दरम्यान उन बच्चों के मन में उम्मीद भरी रोशनी जगी थी।

तब तक हम रांची जिले के सुकुरहटू गांव के नायक टोली में थे। अनिता ने एक घर के दरवाजे पर आवाज दी, सूरज।

जमीन पर घिसटते हुए सूरज अपने छोटे से कमरे से बाहर निकले।

वे ज्यादा कुछ बोले नहीं। पर उनकी आंखें बहुत कुछ बयां कर गई। हाथ नहीं होने के बाद भी सूरज चित्रकारी में खूब मन लगाते हैं।

सरकार से मदद नहीं
सूरज की मां कांति देवी बताती हैं कि वे लोग बीपीएल परिवार हैं। रोजी-रोजगार की चिंता रहती है। उनके दो बच्चे शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं। पर सूरज जन्म से ही विकलांग हैं।

सरकार से कोई मदद तो मिलती नहीं। अब केयर गिवर लोग भी आना बंद कर दिए हैं। इससे परेशानी बढी है।

बेटे के भविष्य के बारे में सोचकर उनकी आंखों से आंसू टपक पडते है।

इस कार्यक्रम के सरकारी जिला समन्वयक अमरेंद्र का कहना है कि सिर्फ रांची जिले में छह से चौदह साल के आठ सौ बच्चे इस कार्यक्रम से जुडे थे। इस योजना के सकारात्मक परिणाम भी मिले हैं। लेकिन केंद्र सरकार से बजटीय प्रावधान नहीं होने कारण इसे अभी स्थगित कर दिया गया है।

इस बीच उसी गांव के केयर गिवर जमील अंसारी भी पहुंचते हैं। सूरज उन्हें देखकर खुश हो जाते हैं।

जमील बताते हैं कि झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद ने भारत सरकार से बजट नहीं मिलने की वजह बताते हुए इस योजना पर रोक लग दी है। इस बाबत पिछले 24 अप्रैल को पत्र जारी किया गया है।

उन लोगों ने सरकारी अधिकारियों और राज्य के मानव संसाधन विकास मंत्री से मिलकर गुहार भी लगाई है कि इस कार्यक्रम को रोका नहीं जाए, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ है।

दीदी क्यों नहीं आतीं
केयर गिवर बबीता देवी बताती हैं कि बहु विकलांग बच्चों पर नजर रखना उनके घर वालों को समझाना वाकई काफी कठिन काम था। लेकिन हम इसे मन से करते थे। यही सोच कर कि गांव में खुद पैदा हुई, पली बढी, तो हमारे प्रयास से गांव के किसी विकलांग बच्चे की जिंदगी संवर जाए।

हम उनके साथ एक गांव मनातू पहुंचे। गांव की गलियों में धूल से सने, मैले कपडे पहनी मानसिक रूप से कमजोर बच्ची की ओर दिखाते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें ये स्थिति देखकर अफसोस होता है। बबिता देवी को देख बच्ची को उनकी मां ने गोद में उठा लिया।

वो बेबसी भरी अंदाज मे बोलीः घर देखें, जानवर संभाले, खेत जाएं या इसे संभाले। महिला ने बबिता से सवाल भी किए आप लोग क्यों नहीं आतीं?

लक्ष्मण मिर्धा दिहाडी मजदूर हैं। उनकी बच्ची विकलांग हैं। उनका सवाल है कि गरीबी ही तो आडे आती है जो बच्ची को उसकी तकदीर पर छोड दिया है।

वे पूछते हैं कि अब इन बच्चियों की दीदी क्यों नहीं आतीं।

केयर गिवर अनिता बाडा बताती हैं कि पिछले साल विश्व विकलांगता दिवस के मौके तीन दिसंबर पर आयोजित एक कार्यक्रम में राज्य की शिक्षा मंत्री ने बहुत कुछ करने के आश्वासन दिए थे, लेकिन नहीं लगता कि सरकार इस ओर गंभीर है।

होगी जिंदगी प्रभावित
बोकारो जिले के एक गांव में केयर गिवर का काम करने वाले राकेश पांडेय बताते हैं कि एक कल्याणकारी योजना स्थगित कर दी गई। विकलांग बच्चों का भविष्य तो संकट में पड ही गया, वे लोग भी बेरोजगार हो गए।

इस योजना से जुडे राज्य समन्वयक डॉ अभिनव बताते हैं कि वे लोग उम्मीद कर रहे हैं कि केंद्र सरकार से बजट मिलेगा। तब योजना चालू हो सकेगी। राज्य की तरफ से प्रस्ताव भी तैयार कर भेजा गया है।

योजना रोक दिए जाने से विकलांग बच्चों की जिंदगी प्रभावित होगी, इस सवाल पर वे कहते हैं जाहिर है यह कार्यक्रम विकलांग बच्चों की जिंदगी हद तक संवारने में कारगर था।
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अभिनव बताते हैं कि समावेशी शिक्षा योजना से आठ हजार बच्चे जुडे थे । इनमें 3500 बहु विकलांग बच्चों की पहचान कर उन्हें केयर दिया जा रहा था।
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