क्यो उठ रहे हैं इस परंपरा को लेकर सवाल
ग्रामसभा द्वारा पत्थलगड़ी में जिन दावों का उल्लेख किया जा रहा है, उसे लेकर सवाल उठने लगे हैं। दरअसल, पत्थलगड़ी के जरिए दावे किए जा रहे हैं कि आदिवासियों के स्वशासन व नियंत्रण वाले क्षेत्र में गैरआदिवासी प्रथा के व्यक्तियों के मौलिक अधिकार लागू नहीं है। लिहाजा इन इलाकों में उनका स्वंतत्र भ्रमण, रोजगार-कारोबार करना या बस जाना, पूर्णतः प्रतिबंध है।
पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में संसद या विधानमंडल का कोई भी सामान्य कानून लागू नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 15 (पारा 1-5) के तहत ऐसे लोग जिनके गांव में आने से यहां की सुशासन शक्ति भंग होने की संभावना है, तो उनका आना-जाना, घूमना-फिरना वर्जित है। वोटर कार्ड और आधार कार्ड आदिवासी विरोधी दस्तावेज हैं तथा आदिवासी लोग भारत देश के मालिक हैं, आम आदमी या नागरिक नहीं। संविधान के अनुच्छेद 13 (3) क के तहत रूढ़ी और प्रथा ही विधि का बल यानी संविधान की शक्ति है।
क्यों चल रहा है यह आंदोलन?
पत्थलगड़ी आंदोलन के पीछे जल, जंगल, जमीन और आदिवासियों की निजी जिंदगी में बाहरी लोगों का हस्तक्षेप है। लेकिन जमीन की सुरक्षा के लिए आदिवासी आवाज उठाते हैं तो उन्हें दबाया जाता है और उनका दमन किया जाता है।
दरअसल, आदिवासियों को यह आशंका सता रही है कि सरकार अंग्रेजों के जमाने में बनी छोटा नागपुर काश्तकारी कानून में संशोधन कर उनकी जमीन छीनने की कोशिश में जुटी है, इसी कारण बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातू के लोग भी कई मौके पर सरकार के रुख पर नाराजगी जता चुके हैं।
साल 2016 में सरकार ने छोटा नागपुर काश्तकारी कानून में संशोधन करने की कोशिश की लेकिन पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था और सरकार को अपने पैर पीछे करने पड़े। इन दिनों कई गांवों में ‘अबुआ धरती, अबुआ राज (अपनी धरती, अपना राज) अब चलेगा ग्राम सभा का राज’ जैसे नारे गूंजते हैं। हालांकि इन गांवों में किसी के आने-जाने पर सीधी रोक तो नहीं है पर अनजान व्यक्ति को टोका जरूर जाता है।
तीर-कमान से लैस युवक, हर गतिविधियों पर पैनी नजर रखते हैं। वैसे पत्थलगड़ी को लेकर कई ग्राम प्रधान मुंह नहीं खोलना चाहते जबकि दर्जनों ग्राम प्रधानों को पत्थलगड़ी का यह स्वरूप उचित नहीं लग रहा है। उनका पक्ष है कि सरकारी योजना-कार्यक्रम का लाभ नहीं लेंगे तो विकास की बात बेमानी होगी। पंचायतों को भी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी।
कई प्रकार के होते हैं पत्थलगड़ी
पत्थर स्मारक- ये खड़े और प्रायः अकेले होते हैं।
मृतक स्मारक पत्थर- ये चौकोर और टेबलनुमा होते हैं। जैसे चोकाहातु (झारखंड) का ससनदिरि के पत्थर स्मारक।
कतारनुमा स्मारक- ये एक कतार में या फिर समान रूप से कई कतारों में होते हैं।
अर्द्धवृताकार स्मारक- ये अर्द्धवृताकार होते हैं।
वृताकार स्मारक- ये पूरी तरह से गोल होते हैं। जैसे महाराष्ट्र के नागपुर स्थित जूनापाणी के शिलावर्त।
ज्यामितिक स्मारक- ये ज्यामितिक आकार वाले होते हैं।
खगोलीय स्मारक- ये अर्द्धवृताकार, वृताकार, ज्यामितिक और टी-आकार के होते हैं। जैसे पंकरी बरवाडीह (झारखंड) के पत्थर स्मारक।