झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों के रहने वाले पांच सौ से ज़्यादा नौजवानों को इंतज़ार है उन लोगों के पकड़े जाने का, जिन्होंने उन्हें 'माओवादी बनाया और हथियारों के साथ आत्मसमर्पण करने का लालच दिया'।
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ना तो ये नौजवान माओवादी थे और ना ही पहले कभी इन्होंने कोई जुर्म किया था। ये तो उन बेरोजगार आदिवासी युवकों की जमात है जो पुलिस के कुछ कर्मचारियों और बिचौलियों के एक गठजोड़ का शिकार हुई है।
इसी गांव के रहने वाले है दिलीप तिरु पास की ही एक पत्थर की खदान में मज़दूरी करते हैं। दिलीप पर ज़िम्मेदारियों का पहाड़ है क्योंकि घर में उनके अलावा कोई और कमाने वाला नहीं है। उनको लगा कि पुलिस की नौकरी अगर उन्हें मिल जाए तो उनकी सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी।
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नौकरी का लालच
दिलीप ने अर्द्धसैनिक बल के कैम्प में कई महीने बिताए। मगर, जब उन्हें पता चला कि वो पुलिस अधिकारियों और बिचौलिओं के जाल में फंसकर बेवक़ूफ़ बन गए हैं तो उनके सारे सपने चकनाचूर हो गए। बीबीसी को उन्होंने बताया कि उनसे पहले कहा गया था कि अर्द्धसैनिक बल में सिपाही की नौकरी मिलेगी।
बाद में जब उन्होंने नौकरी के लिए पैसे दे दिए तब कहा गया कि उन्हें माओवादी बनकर आत्मसमर्पण करना पड़ेगा। दिलीप कहते हैं, "हम इसलिए झांसे में आ गए क्योंकि हमें बंद पड़े बिरसा मुंडा कारागार में सीआरपीएफ़ कैम्प दिखाया गया। हमसे कहा गया कि हमें यहीं प्रशिक्षण दिया जाएगा। हमसे पैसे मांगे गए, मैंने पचास हज़ार रुपयों का इंतज़ाम किया। बाद में वो दिन भी आ गया जब हमसे कहा गया कि हमारी नौकरी होने वाली है।"
आगे वो बताते हैं, "हमें एक सरकारी वाहन में ले जाया गया। रास्ते में हमसे कहा गया कि हमें कहना होगा कि हम नक्सली हैं और हथियार के साथ आत्मसमर्पण कर रहे हैं। फिर हमें हथियार थमाया गया, यह कहकर कि इसे अधिकारियों के सामने जमा कर दो तब हमें आत्मसमर्पण नीति के तहत फ़ौरन नौकरी मिल जाएगी। हमने ऐसा ही किया।"
पैसे की बंदरबांट हुई?
बीबीसी के पास कई दस्तावेज़ मौजूद हैं जिसमें इस फ़र्ज़ी आत्मसमर्पण को लेकर लोअर बाज़ार थाने में दर्ज की गई प्राथमिकी के अलावा मामले में गिरफ्तार किए गए मुख्य अभियुक्त का इक़बालिया बयान और झारखण्ड सरकार द्वारा केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी गई रिपोर्ट भी शामिल है।
जिसमें सरकार ने पूरे प्रकरण को गंभीर मानते हुए जांच के दायरे को बढ़ाने की सिफ़ारिश की है। तो आख़िर क्यों कुछ पुलिस के अधिकारी बिचौलिए के माध्यम से आत्मसमर्पण नीति के नाम पर आदिवासी नौजवानों को ठगने का काम कर रहे थे?
इस सवाल को झारखंड कौंसिल फॉर डेमोक्रटिक राइट्स ने उच्च न्यायलय में दायर एक याचिका में उठाया है। इस संस्था से जुड़े शशि भूषण पाठक का कहना है कि आत्मसमर्पण नीति में किए गए आर्थिक प्रावधानों की बंदरबांट करने की नीयत से यह सबकुछ किया गया है।
उन्होंने कहा, "हमें इसका मलाल तो है ही कि आदिवासी लड़कों से पैसे ऐंठे गए, उन्हें धोखा दिया गया, उन्हें माओवादी बनाया गया। मगर गंभीर बात यह है कि जो हथियार उन्हें दिए गए वो कहां से आए और उन्हें किसने हासिल किया। इसका मतलब है कि अवैध हथियारों की तस्करी में पुलिस शामिल है।"
अकेले जमगाई के इलाके के 15 से 20 आदिवासी युवक ऐसे हैं जिन्होंने अपनी जमीन बेचकर या फिर माँ के गहने बेचकर पैसों का इंतज़ाम कर, बिचौलियों को दिया ताकि उन्हें पुलिस की नौकरी मिल सके।
साजिश
झारखंड के सुदूर ग्रामीण इलाकों में कई ऐसे नौजवान हैं जो इस चक्रव्यूह में जा फंसे हैं। रांची के चुटिया थाने में एक प्राथमिकी दर्ज की गई है जिसमें रबि बोदरा नाम के जिस व्यक्ति को मुख्य अभियुक्त बनाया गया उसका कहना है कि वो एक लम्बे अरसे तक मिलिट्री गुप्तचर के लिए काम करता रहा है।
अपनी गिरफ्तारी के बाद बोदरा ने जो बयान दिया वो काफी चौंकाने वाला है। बीबीसी के पास मौजूद दस्तावेज के मुताबिक़, बोदरा ने स्वीकार किया है कि मिलिट्री गुप्तचर के लिए पूर्वोत्तर राज्यों में काम करने के दौरान उन्होंने कई नागा और मणिपुरी 'उग्रवादी युवकों' का आत्मसमर्पण करवाया था।
उन्होंने यह भी माना कि फ़ौज के एक पुराने परिचित के बुलावे पर वो झारखंड आए और उनकी जान-पहचान कई बड़े पुलिस अधिकारियों से हुई।
उन्होंने पुलिस में नौकरी का लालच देकर आदिवासी युवकों को माओवादी कहकर आत्मसमर्पण करवाने का प्रोग्राम एक कोचिंग सेंटर के मालिक दिनेश प्रजापति और कुछ पुलिस के अधिकारियों के साथ मिलकर बनाया।
मगर इस पूरे प्रकरण में शिकार हुए आदिवासी युवकों का आरोप है कि इसमें अर्द्धसैनिक बल सीआरपीएफ़ और राज्य के पुलिस अधिकारियों की सांठ गांठ भी है क्योंकि उन्हें एक साल तक अर्द्धसैनिक बल कोबरा बटालियन के कैम्प में रखा गया जो रांची की पुरानी जेल में स्थित है। जमगाई के मनुएल टोप्पो कहते हैं कि यह मामला तब सामने आया जब एमवी राव ने रांची में सीआरपीएफ़ के महानिरीक्षक की कमान संभाली।
राव ने विभाग और राज्य पुलिस के अधिकारियों को चिट्ठी लिख कर पूछा कि अर्द्धसैनिक कोबरा बटालियन के कैम्प में 514 युवक किस हैसियत से रह रहे हैं?
सरकार ने नक्सलवाद की समस्या से निपटने के लिए कई राज्यों में समर्पण नीति की घोषणा की है जिसमें आत्मसमर्पण करने वाले छापामारों के पुनर्वास की योजना है।
झारखंड सरकार के गृह विभाग के उप सचिव अरविन्द कुमार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी अपनी रिपोर्ट में पुष्टि की है कि युवकों को नक्सली बताकर आत्समर्पण कराया गया है और इस प्रकरण में हथियारों की तस्करी भी शामिल है।