अजय मीनिया जम्मू। यदि कहीं पर आतंकियों के छुपने की सूचना है। तो सबसे पहले वहां मौजूद लोगों को चेतावनी दी जाए। साफ तौर पर कहा जाए कि आतंकी बाहर आ जाएं और यदि वो बाहर नहीं आना चाहते तो उस जगह को पूरी तरह से बिस्फोट से उड़ा दिया जाए। कब तक यूं बंधी बनाने के नाम पर आतंकियों को पनाह मिलती रहेगी और इन्हें बचाने के नाम पर जवान शहीद होंगे। सेना के रिटायर कर्नल वी के साही का कहना है कि कश्मीर में अकसर ऐसा होता आया है। आतंकियों को स्थानीय स्तर पर पनाह मिलती है। जिसकी आढ़ में वो छुप जाते हैं और फिर लोगों को बंधक बनाने के नाम पर सुरक्षाबलों को अंदर आने दिया जाता है। यहां मिलकर सुरक्षाबलों पर हमला बोल दिया जाता है। कश्मीर में हमलों से निपटने की रणनीति में बदलाव जरूरी है। सेना को राजनीति से दूर रखकर कार्रवाई करने की आवश्यकता है। सेना को साफ तौर पर निर्देश दिए जाने चाहिए। यदि कहीं पर कोई आतंकी पनाह लेकर छुपा है तो साफ चेतावनी दी जाए। या तो वह बाहर आ जाएं या फिर उस जगह को आग के हवाले कर दें। या तो उन्हें पनाह देने वाले बाहर करेंगे या फिर सब मारे जाएंगे। इसी से आतंकियों को पनाह मिलना बंद होगा। पांच सालों बाद सीओ स्तर का अफसर खोया हंदबाड़ा में हुई मुठभेड़ में सीओ और मेजर स्तर के अफसर शहीद हो गए। सेना को पिछले पांच सालों में यह सबसा बड़ा नुकसान है। इससे पहले वर्ष 2015 में कुपवाड़ा के हाजीनाका जंगल में 41 आर आर के सीओ संतोष महाडिक शहीद हो गए थे। वे महाराष्ट्र के रहने वाले थे। उनकी पत्नी स्वाति ने 2017 में सेना ज्वाइन की था। वहीं इसी वर्ष 42 आर आर के सीओ कर्नल एम एम राय पुलवामा के त्राल में मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए थे। साल में सेना को दूसरा बड़ा आघात वर्ष 2020 में अब तक 62 आतंकी मारे जा चुके हैं। पिछले चार महीनों में सेना को यह दूसरा बड़ा आघात पहुंचा है। 6 अप्रैल को कुपवाड़ा में आतंकियों से मुठभेड़ में सेना के पांच जवान शहीद हो गए थे। अब सेना के सीओ, मेजर, नायक और लांस नायक समेत चार जवान शहीद हो गए। यहां तक कि लॉकडाउन में सेना को बड़ा नुकसान सहना पड़ा है। कर्नल साही का कहना है कि यदि बदलाव न हुआ तो ऐसे नुकसान होते रहेंगे।