उम्मीदों और वादों की बुनियाद पर बनी जम्मू-कश्मीर सरकार आज दो साल पूरे कर रही है। इन दो वर्षों में प्रदेश मंत्रिमंडल के फैसलों में देरी पर केंद्र और प्रदेश में रार बरकरार है। मंत्रिमंडल में लिए गए बड़े फैसलों की फाइलें या तो लोकभवन में फंसी हैं या केंद्र और प्रदेश सरकार के बीच आपत्तियों के साथ घूम रहीं हैं। केंद्र और प्रदेश में संतुलन बैठाना मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के लिए बड़ा इम्तिहान भी है।सरकार के पास दो साल बाद भी न तो बिजनेस रूल्स हैं और न ही एडवोकेट जनरल है। सरकार पूर्ण राज्य के दर्जे पर भी विरोध झेल रही है।
राहत के तौर पर देखा जाए तो सरकार ने ओल्ड पेंशन, बाढ़ प्रभावितों को पांच मरला भूमि और पंजाबी सहित गोजरी भाषा को आधिकारिक बनाने के फैसले से बड़ी आबादी को साधने की कोशिश की है। लेकिन डेलीवेजर और सामान्य वर्ग आरक्षण का मामला फंसा है।सरकार की कैबिनेट ने दिसंबर 2025 में सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण कोटा बढ़ाने की नीति को मंजूरी दी थी। इस नीति से नौकरी में सामान्य वर्ग के युवाओं के लिए आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत के पार पहुंचाने की सिफारिश की गई। लेकिन आज यह नीति धरातल पर नहीं उतर पाई है। प्रदेश सरकार के सामने चुनौतियां चुनावी वादों की भी बनी हुई हैं। 200 यूनिट मुफ्त बिजली के वादे को प्रदेश सरकार ने सूर्य घर बिजली योजना से जोड़ दिया है। हालांकि इस योजना से जुड़ने के बाद अब तक 4000 से अधिक परिवार मुफ्त बिजली का लाभ ले रहे हैं।