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Jammu News: जिला स्तर पर उचित थैलेसीमिया परीक्षण की दरकार

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-पहले पता न चलने पर आज भी मां के पेट से जन्म ले रहे इस बीमारी के पीड़ित
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-अस्पतालों में पीड़ितों के लिए खून की जद्दोजहद जारी
- विश्व थैलेसीमिया दिवस आज
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में स्वास्थ्य देखभाल को मजबूत बनाने के भले ही दावे किए जा रहे हैं लेकिन कई दुर्लभ और गंभीर बीमारियों की शुरुआत में पकड़ के लिए जिला स्तर पर उचित परीक्षण सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाई है। थैलेसीमिया बीमारी की बात करें तो प्रदेश स्तर पर एसएमजीएस अस्पताल जम्मू में ही गर्भवती महिलाओं की उचित स्क्रीनिंग और अन्य जरूरी परीक्षण सुविधाएं उपलब्ध हैं, जबकि अन्य जिलों में ऐसी व्यवस्थाएं न होने के कारण थैलेसीमिया के पीड़ितों का मां के पेट से जन्म लेना जारी है।
एसएमजीएस अस्पताल में थैलेसीमिया पीड़ितों के लिए विशेष डे केयर सेंटर स्थापित हैं। इस केंद्र में जम्मू संभाग से 330 पीड़ित पंजीकृत हैं, जिसमें करीब 20 नेगेटिव ब्लड ग्रुप वाले हैं। यहां रोजाना 25 से 30 पीड़ितों को खून चढ़ाया जाता है। थैलेसीमिया बीमारी में मानव शरीर में रेड सेल (कोशिकाएं) सही तरह से काम नहीं करते हैं और पर्याप्त खून का उत्पादन नहीं हो पाता है। जिसमें पीड़ित को हफ्ते या 15 दिन में दो या तीन बार नियमित रूप से खून चढ़ाना पड़ता है। इस केंद्र में रामबन, डोडा, भद्रवाह, राजोरी, पुंछ आदि जिला स्तर से पीड़ित आ रहे हैं। श्रीनगर में एक केंद्र को शुरू किया गया है, लेकिन वहां 10 से 15 पीड़ित ही हैं। दिसंबर 2023 में राजोरी मेडिकल कालेज में थैलेसीमिया केंद्र की शुरुआत की गई थी, लेकिन उसे अभी चालू नहीं किया जा सका है। एसएमजीएस अस्पताल में पीड़ित के लिए निशुल्क जरूरी दवाएं और खून की व्यवस्था की जाती है लेकिन पहले से अस्पतालों में खून की कमी के कारण ऐसे पीड़ितों को लगातार जद्दोजहद करनी पड़ती है। इन पीड़ितों को खास तरह के विशेष बैग में नेट टेस्टिंग खून चढ़ाया जाता है, जिसमें शरीर से वाइट सेल अलग कर दिए जाते हैं, जिससे पीड़ित को इंफेक्शन और रिएक्शन होने की आशंका कम हो जाती है। केंद्र को माह में दो रविवार को कामकाज वाले पीड़ितों के लिए खून चढ़ाने को खोला जाता है।
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माइनर केरियर मामलों में बच्चे को 25 प्रतिशत बीमारी होने की आशंका
थैलेसीमिया तीन प्रकार का है। जिसमें पहले प्रकार में फुल ब्लूम मेजर थैलेसीमिया होता है, जिसमें पीड़ित को ट्रांसफ्यूजन (खून) निर्भर माना जाता है। ऐसे पीड़ितों की जन्म से छह माह के भीतर पहचान हो जाती है। उसमें खून की कमी, तीली, जिगर का बढ़ाना, कमजोरी आना आदि लक्षण दिखने लगते हैं। मेजर थैलेसीमिया पीड़ित को नियमित रूप से खून चढ़ाने की जरूरत होती है। थैलेसीमिया का दूसरा प्रकार इंटर मीडिया होता है, जिसमें जन्म के दो साल के भीतर तक पहचान हो जाती है। इसमें पीड़ित को खून चढ़ाने की जरूरत कम पड़ती है। इसे नान ट्रांसफ्यूजन निर्भर कहा जाता है, लेकिन ऐसे मरीजों की निगरानी की भी जरूरत होती है। मेजर और इंटर मीडिया थैलेसीमिया में पीड़ित के भीतर आयरन बढ़ने का खतरा रहता है, जिसे दवाएं देकर सामान्य बनाने की कोशिश की जाती है। थैलेसीमिया के तीसरे प्रकार में माइनर केरियर होता है। इसमें पीड़ित को खुद कोई अधिक शारीरिक समस्या नहीं होती है, लेकिन अगर उसके शारीरिक संपर्क में दूसरा माइनर केरियर आ जाता है तो उनके बच्चों में 25 प्रतिशत तक थैलेसीमिया से पीड़ित होने की आशंका रहती है।
एसएमजीएस में ही एंटी नेटल डायग्नोसिस की सुविधा
प्रदेश स्तर पर एसएमजीएस अस्पताल जम्मू में ही थैलेसीमिया की पहचान के लिए एंटी नेटल डायग्नोसिस की सुुविधा उपलब्ध है। अस्पताल के स्त्री रोग विभाग में आने वाली गर्भवती महिलाओं की थैलेसीमिया स्क्रीनिंग की जाती है, जिसमें महिला का माइनर केरियर परीक्षण करवाया जाता है, अगर वह पाजिटिव आती है तो उसके पति का भी माइनर केरियर परीक्षण करवाया जाता है, दोनों में इस केरियर की पुष्टि होने पर उन्हें पेट में पल रहे बच्चे को पैदा न करने की सलाह दी जाती है। मेडिकल कानून में ऐसे मामलों में गर्भपात का प्रावधान है। माइनर मामलों में 10 से 14 हफ्ते से खास तरह का टेस्ट होता जिसमें मां के पेट में बन रहे बच्चे का टिशू या पेट से पानी का सैंपल लेकर थैलेसीमिया की पुष्टि की जाती है। इस विशेष केंद्र में वर्ष 2023 में 15 मामलों में परीक्षण किए गए, जिसमें पांच में पेट में पल रहे बच्चे में थैलेसीमिया की पुष्टि हुई। इसमें गर्भपात का फैसला दंपती को लेना होता है।
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बेहतर ब्लड ट्रांसफ्यूजन और आयरन नियंत्रण से लंबा जीवन जी सकते पीड़ित
विश्व थैलेसीमिया दिवस के उपलक्ष्य में मंगलवार को एसएमजीएस अस्पताल के सभागार में करवाए गए एक लेक्चर में दिल्ली से आए बोनमेरो प्रत्यारोपण विशेषज्ञ डा. गौरव खैरया ने थैलेसीमिया उपचार पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि बोनमेरो प्रत्यारोपण से थैलेसीमिया बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है। एसएमजीएस में कार्यरत बाल रोग विशेषज्ञ डा. संजीव डिंगरा ने बताया कि बेहतर ब्लड ट्रांसफ्यूजन और शरीर में नियंत्रित आयरन से थैलेसीमिया का पीड़ित 50 से 70 वर्ष तक जी सकते हैं। हमारे पास कई थैलेसीमिया पीड़ित इंजीनियर, एमबीबीएस, बीडीएस, फीजियोथैरेपी, व्यापारी, एमबीए आदि वर्ग से संबंधित हैं। इस दौरान अस्पताल में एक चिकित्सा शिविर में पीड़ितों के भाई बहन का बोनमेरो सैंपल के लिए परीक्षण किए गए। जेएंडके थैलेसीमिया वेलफेयर सोसायटी के प्रधान इंजीनियर सुधीर सेठी ने कहा कि थैलेसीमिया मरीजों के लिए रक्तदाताओं को खुलकर आगे आना चाहिए। इसके साथ नियमित रूप से रक्तदान शिविरों को सुनिश्चित बनाया जाए। थैलेसीमिया की शुरू में पकड़ के लिए सभी चिकित्सा केंद्रों में जरूरी परीक्षण की व्यवस्था की जाए।
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