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मुठभेड़ के बाद खुलासा: लोग आतंकियों को नहीं दे रहे पनाह, घाटी में दहशतगर्द अब मस्जिदों-मदरसों में बना रहे ठिकाना

Tue, 12 Apr 2022 12:25 AM IST
विमल शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर

सार

अधिकारियों के अनुसार सरकार और सुरक्षा बलों दोनों के प्रयासों से कश्मीर की आम जनता में आतंकियों को देखने के नजरिये में बड़ा बदलाव आया है। लोग अब आतंकियों को पनाह और अन्य मदद देने से परहेज करने लगे हैं।
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सुरक्षाबल। - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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कश्मीर की जनता के बीच पनाह नहीं मिलने पर आतंकी फि र से मस्जिदों और मदरसों में ठिकाने बना रहे हैं। सुरक्षा बलों से छिपने के अलावा किशोरों और युवाओं को बरगलाने के इरादे से भी आतंकी ऐसी जगह पर ठिकाने तैयार कर रहे हैं। सरकार ने निगरानी बढ़ाने और आतंकियों को पनाह देने वाले घरों को जब्त करने का फैसला लिया है। इसके बाद से आतंकी संगठन पुराने तरीके अपनाने लगे हैं। 

कश्मीर की आम जनता में आतंकियों को देखने के नजरिये में बड़ा बदलाव

अधिकारियों के अनुसार सरकार और सुरक्षा बलों दोनों के प्रयासों से कश्मीर की आम जनता में आतंकियों को देखने के नजरिये में बड़ा बदलाव आया है। लोग अब आतंकियों को पनाह और अन्य मदद देने से परहेज करने लगे हैं।

हजरतबल दरगाह और चरार-ए-शरीफ  में छिपते थे

आतंकी 1990 के दशक की शुरुआत में हजरतबल दरगाह और चरार-ए-शरीफ  में छिपते थे। हाल ही में दक्षिण कश्मीर में हुईं कुछ मुठभेड़ों में आतंकियों के मस्जिदों और मदरसों में ठिकानों का पता चला है। अधिकारियों ने बताया कि पिछले कुछ सप्ताह में कुलगाम, नैना बटपोरा और चेवा कलां में हुई तीन मुठभेड़ों में यही बात देखने को मिली।

धार्मिक भावनाओं भड़काने के दोहरे मकसद से ऐसा किया

यहां आतंकियों ने मस्जिदों और मदरसों में पनाह ले रखी थी। विश्लेषण में पता चला है कि आतंकियों ने सुरक्षा बलों ने बचने और लोगों में धार्मिक भावनाओं भड़काने के दोहरे मकसद से ऐसा किया। 

सुरक्षा बलों के आने पर बन जाते हैं धर्म प्रचारक 

सेना ने पिछले दिनों पुलवामा जिले में रऊफ  नामक आतंकी को पकड़ा था। उसने पूछताछ करने वाले अधिकारियों को बताया कि आतंकियों ने एक मस्जिद में शरण ले रखी थी और जब भी सुरक्षा बल आते तो वे धर्म प्रचारक बन जाते। पुलवामा जिले के चेवा कलां में मुठभेड़ में मारे गए जैश-ए-मोहम्मद के दो आतंकियों ने एक मस्जिद में पनाह ले रखी थी।

मलिक इससे पहले छह-सात साल तक जामिया मस्जिद में इमाम रहा

इनमें से एक पाकिस्तानी था। इस मदरसे को मौलवी नसीर अहमद मलिक ने 2020 में शुरू किया था। मलिक इससे पहले छह-सात साल तक जामिया मस्जिद में इमाम रहा। वह गांव में 4 से 10 साल तक के बच्चों को धार्मिक उपदेश देता था।

जकात का पैसा आतंकवाद में लगा रहा था मौलवी

मौलवी नसीर अहमद मलिक 2016 से पुलवामा, बडगाम, श्रीनगर, कुलगाम और अनंतनाग जिलों के कई गांवों से जकात इकट्ठा करता था। चेवा कलां में मुठभेड़ वाली जगह से मिले दस्तावेजों से यह शक हकीकत में बदल गया कि वह दान में मिले धन का इस्तेमाल पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों की मदद के लिए करता था।

यह भी पता चला कि मदरसे में मारे गए आतंकी वहां कम से कम दो महीने से रह रहे थे। अधिकारियों के मुताबिक मलिक पर जन सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

आतंकवाद के कुचक्र से बचाने की अपील

सुरक्षा बलों के अनुसार मदरसों का इस्तेमाल आतंकी केवल स्थानीय कश्मीरी जनता को निशाना बनाकर हमले करने के लिए नहीं करते बल्कि कश्मीर के बच्चों और युवाओं को गुमराह करने के लिए भी करते हैं। सुरक्षा बल अब विशेष शिविर आयोजित कर इन किशोरों के अभिभावकों को आगाह कर रहे हैं। अधिकारियों ने कश्मीर के लोगों से इन करतूतों के खिलाफ  आवाज उठाने और अपने बच्चों को आतंकवाद के कुचक्र में पड़ने से बचाने का अनुरोध किया है।

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