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हाईकोर्ट ने कहा, हर छह महीने दरबार मूव न्यायसंगत नहीं

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जम्मू। हर छह महीने दरबार मूव करना पैसों और वक्त को नष्ट करना है। यह न्यायसंगत नहीं है। हाईकोर्ट ने दरबार मूव को लेकर दायर याचिका पर दलीलें सुनने के बाद मंगलवार को महसूस किया कि हर छह महीने दरबार मूव करना पैसों का नाश है और आधुनिक तकनीक के समय में कर्मियों का काम करना भी मुश्किल। लेकिन हाईकोर्ट इस पर कोई फैसला नहीं ले सका। ऐसे में हाईकोर्ट ने संवैधानिक प्रशासन पर छोड़ा है कि वह इस 148 साल पुरानी परंपरा की समीक्षा करें और इस पर अंतिम निर्णय लें। चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्ठिस रजनीश पोसवाल वाली खंडपीठ ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि केंद्र तय करे कि इसकी जरूरत है या नहीं। हर छह महीने में 200 करोड़ का खर्च होता है। हाईकोर्ट ने 93 पन्नों वाली जजमेंट इस याचिका पर दी है। खंडपीठ ने सीनियर एडवोकेट मोनिका कोहली के सुझावों को अपनी जजमेंट में सूचीबद्ध किया है।  जिन्होंने हाईकोर्ट के रिकार्ड के डिजिटाइज करने का मामला उठाया था। हाईकोर्ट ने कहा कि दरबार मूव, उसके मूल और कार्यान्वयन में सार्वजनिक हित की अवहेलना, इसके प्रतिकूल प्रभावों, विशाल राजकोषीय, सामाजिक और आर्थिक लागतों के बारे में तथ्यों से यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि व्यवस्था की स्वामित्व, व्यवहार्यता और प्रभावकारिता एक  ऐसा मामला है जो \\\"अनदेखी और भुला दिया जाता है। कोर्ट में इस संबंध में हमारे सामने जो सामग्री पेश की गई इससे हमारा न्यायिक विवेक हमें घंटी बजाने के लिए मजबूर करता है अन्यथा हम अपने न्यायिक कर्तव्य का निर्वहन करने या राष्ट्र और जम्मू-कश्मीर के लोगों, विशेषकर इसकी आम महिला और पुरुष, गरीब और गरीबों के हित में मांग के अनुसार अपना संवैधानिक कार्य करने में विफल रहेंगे। कोर्ट अपने क्षेत्राधिकार के तहत इतना ही कर सकता है कि हम इसे लेकर सरकार के समक्ष घंटी बजा दें। दरबार मूव लागू करने संबंधी हमने अपने कई कारण और जजमेंट रिकार्ड की हैं। हमें कई कदम उठाने हैं, जिसकी हमें जानकारी नहीं है। जैसे दरबार मूव में सुरक्षा बलों और पुलिस द्वारा पर कितना खर्च होता होता है। हमें लगता है कि यह खर्च अन्य ढांचे के बराबर ही है। जो कि हमें नहीं बताया गया। कोर्ट ने अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा कि हमनें अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा पर अपनी सीमाएं सूचीबद्ध कर ली हैं, जिसके तहत हम यह नहीं कर सकते कि दरबार मूव जारी हो या नहीं। हाईकोर्ट ने अपनी जजमेंट को केंद्रीय गृह सचिव और प्रदेश के मुख्य सचिव को भेजने को कहा, ताकि इसकी समीक्षा हो और इस पर कोई निर्णय लिया जा सके।  हाईकोर्ट की जजमेंट में पहला सवाल ही यहीं उठता है कि क्या कोई सरकार अपनी राजधानी बदलने के लिए हर छह महीने में 200 करोड़ खर्च करने की क्षमता रखती है। क्या यह एक ऐसे प्रदेश के लिए स्वीकारीय है, यहां के लोग वित्तीय  समस्या से जूझ रहे हों।  एडवोकेट मोनिका कोहली ने कोर्ट के ध्यान में लाया कि केंद्र की तरफ से नागरिक सचिवालय के रिकार्ड को डिजिटल करने के लिए हार्डवेयर और साफ्टवेयर के लिए 24 करोड़ जारी किए हैं। कोहली ने दरबार मूव का इतिहास बताते हुए कहा कि महाराजा हरी सिंह ने दरबार शिफ्ट करने के बंदोबस्त सिर्फ इसलिए किए थे कि गर्मी में कश्मीर में अच्छे मौसम की वजह से वहां पर रहे और जब कश्मीर में अधिक ठंड हो तो जम्मू में रहे। मौजूदा समय में रूम हीटर हैं, एयर कंडीशनर हैं। जिससे कि दोनों जगह पर रहा जा सकता है। दोनों शहर बड़े अच्छे तरीके से हवाई और सड़क मार्ग से कनेक्टड हैं। इससे साफ है कि सिर्फ मौसम के लिए दरबार मूव करना उचित नहीं। हाईकोर्ट ने अपनी जजमेंट में कहा कि यह दिमाग में बिठाने की बात है कि 300 किलोमीटर लंबे हाइवे पर रिकार्ड ले जाना सुरक्षा, इसके चोरी होने, खराब होने और नष्ट होने का खतरा है। दरबार में कई महत्वपूर्ण दस्तावेज होते हैं। कई प्राचीन दस्तावेज हैं। ऐसे में किसी भी स्तर पर इनकी सुरक्षा के लिए समझौता नहीं करना चाहिए। जेएनएफ
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