संवाद न्यूज एजेंसी
दोमाना। स्मार्ट सिटी बन रहे जम्मू के गांवों के हालात बदहाल हैं। मूलभूत सुविधाओं के लिए लोगों को ठोकरें खाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। पानी, बिजली, सड़क सहित अन्य जरूरतों के लिए आए दिन प्रदर्शन तक हो रहे हैं। इसके बावजूद प्रशासन आमजन की सुध लेने के लिए तैयार नहीं है। छोटी सरकार यानी पंचायत उदासीन रवैया अपनाए है। मृत व्यवस्था में दुख पहाड़ों की तरह खड़े हैं। श्मशानघाट के लिए लोगों को कई किलोमीटर दूर जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति तब है जब स्थानीय निकाय व पंचायत चुनाव को लेकर गतिविधियां तेज हैं।
मढ़ ब्लॉक का करलूप गांव इन दिनों अंतिम स्थान के लिए संघर्ष कर रहा है। खुले आसमान के नीचे श्मशानघाट दर्द की व्यथा बयां कर रहा है। आम दिनों में तो संस्कार हो रहे हैं, मगर अब बारिश के मौसम में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। चहारदीवारी के साथ छत के अभाव में अपनों को विदा करने में दर्द बढ़ रहा है। दूसरे राज्यों से आए रिश्तेदार भी सरकार को कोस रहे हैं। समस्या पता होने के बावजूद जिम्मेदार लापरवाह बने हैं, जिसका खामियाजा पूरे गांव को भुगतना पड़ रहा है।
लोगों ने बताया कि यहां पर तो मरने वालों को भी चैन नहीं है। क्या मुर्दा, क्या जिंदा सभी परेशान हैं। अंतिम संस्कार के लिए श्मशानघाट खुद मृत हालात में है। दीवारें तो छोड़ो, छत भी नहीं है। पहुंचने के लिए रास्ता खराब है। कई बार सरकार व पंचायत से गांव में श्मशानघाट बनवाने की मांग की, लेकिन आज तक किसी ने सुध नहीं ली।
दूसरे राज्यों से आए रिश्तेदार भी कुप्रबंध को कोसते
स्थानीय निवासी विजय कुमार, आशु पंडित और अश्विनी कुमार का कहना है - गांव में श्मशानघाट नहीं होने के कारण बरसात में काफी परेशानी उठाती पड़ रही है। रिश्तेदार दूसरे राज्यों व अन्य जिलों से भी आते हैं, वह ऐसे हालात देखकर शर्मिंदा महसूस करते हैं। आसपास के करीब सभी गांवों में श्मशानघाट है, बस करलूप में ही नहीं है। लोगों ने सरकार से जल्द श्मशानघाट बनाने की मांग की।
श्मशानघाट की दिक्कत जल्द दूर हो जाएगी। शेड बनाने के लिए दो लाख रुपये रखे गए हैं। इसके टेंडर लग चुके हैं। उम्मीद है कि इसी माह से काम शुरू हो जाएगा।
- हरजीत सिंह, सरपंच