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Kargil Vijay Diwas: रतन चंद के बलिदान होने के दो दिन बाद घर पहुंचा एक खत, आखिरी सांस तक लड़े दिलेर सिंह

Thu, 25 Jul 2024 05:52 PM IST
गुलशन कुमार अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू कश्मीर

सार

रतन चंद 1987 में सेना की 18 ग्रेनेडियर में भर्ती हुए थे। उन्होंने कमांडो प्रशिक्षण लिया था। 1999 में जब पाकिस्तान सेना ने कारगिल के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया तो उसके पति की बटालियन को टाइगर हिल को पाकिस्तानी सेना से मुक्त करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
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कारगिल विजय दिवस - फोटो : सेना
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विस्तार
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वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना के कब्जे से टाइगर हिल को मुक्त करवाते समय उधमपुर निवासी जांबाज सिपाही रतन चंद शहीद हुए थे। उनकी शहादत को आज भी लोग याद करते हैं। शहीद के बच्चों का कहना है कि उनको अपने पिता की शहादत पर नाज है। पत्नी ने बताया कि पति ने कारगिल से पत्र भेजा था, जोकि उनको पति के शहीद होने के बाद मिला था।

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शहीद की पत्नी सुषमा देवी ने बताया कि पति रतन चंद 1987 में सेना की 18 ग्रेनेडियर में भर्ती हुए थे। उन्होंने कमांडो प्रशिक्षण लिया था। 1999 में जब पाकिस्तान सेना ने कारगिल के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया तो उसके पति की बटालियन को टाइगर हिल को पाकिस्तानी सेना से मुक्त करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। पांच जुलाई को दुश्मनों से लोहा लेते हुए पति शहीद हो गए थे। शव न मिलने पर पहले सेना ने बताया कि उसका पति लापता हो गए हैं। लेकिन कुछ दिनों के बाद सेना ने सूचित किया कि पांच जुलाई को रतन चंद दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए।

बलिदान होने के दो दिन बाद मिला था पति का लिखा हुआ खत

सुषमा देवी ने बताया कि 30 जून, 1999 को पति रतन चंद ने उन्हें एक खत लिखा था, जिसमें बताया था कि वह ठीक हैं और बच्चों के साथ पूरे परिवार का हाल भी जाना था। यह खत उन्हें सात जुलाई को पति की मौत के दो दिन बाद मिला। जब खत पढ़ा तो लगा ही नहीं कि पति युद्ध में शहीद हो चुके हैं।
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पति कारगिल में हुए शहीद, देश सेवा का जज्बा लेकर शारदा बनीं डीडीसी सदस्य

कारगिल में दुश्मनों से लोहा लेते सेना की 12 जैकलाई के जवान दिलेर सिंह भाऊ शहीद हो गए थे। जम्मू के पंजतूत पलांवाला के दिलेर अपने पीछे पत्नी और तीन बच्चे छोड़ गए। उस समय बड़ा बेटा नौ साल और छोटा बेटा तीन साल का था। पत्नी शारदा भाऊ ने तीनों बच्चों का पालन पोषण किया। कुछ साल बाद एक सड़क दुर्घटना में बड़े बेटे की मौत हो गई। बावजूद इसके शारदा भाऊ ने देश सेवा का जज्बा लेकर डीडीसी सदस्य का चुनाव जीता।

अखनूर से डीडीसी सदस्य चुनी गईं शारदा भाऊ कहती हैं कि देश की रक्षा करते शहीद हुए पति के बाद तीन बच्चों के पालन पोषण के लिए कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ा। लेकिन सरकार, सेना और लोगों के सहयोग से सभी परेशानियों को पीछे छोड़ कर नई राह पकड़ी। उन्होंने बताया कि देश के लिए शहीद होना गर्व की बात है। नौजवान पीढ़ी को नशा और अन्य बुराइयों को छोड़कर सेना में जाकर देश की रक्षा करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि देश के हर नागरिक को देश की रक्षा के लिए प्रण लेना चाहिए। उन्होंने बताया कि डीडीसी सदस्य बनकर लोगों की सेवा करने का मौका मिला है। केंद्र सरकार और सेना देश के शहीद जवानों के लिए कार्यक्रम का आयोजन करती है जो शहीदों के परिजनों के लिए गर्व की बात है। 
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