श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने माना है कि पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य मानवाधिकार आयोग (एसएचआरसी) द्वारा की गई सिफारिशों को बिल्कुल भी निष्पादन योग्य आदेश के बराबर नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति विनोद चटर्जी कौल की पीठ ने कहा, यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि आयोग द्वारा की गई सिफारिशों को निष्पादन योग्य आदेश के बराबर नहीं माना जा सकता। आयोग विवादित तथ्यों पर निर्णय लेने के लिए न तो न्यायिक प्राधिकारी है और न ही अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी है। उन्होंने कहा, इसलिए आयोग द्वारा की गई सिफारिशों को विवादित तथ्यों को हल करने के लिए निर्णय नहीं कहा जा सकता है और वे आयोग के समक्ष पक्षों के लिए बाध्यकारी नहीं हैं।
अदालत मोहम्मद अमीन खान द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एसएचआरसी की सिफारिश के आधार पर 1994 के एसआरओ 43 के तहत अधिकारियों को मुआवजा देने और परिवार के एक सदस्य को रोजगार देने का निर्देश देने की मांग की गई थी, जो अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद समाप्त हो गई है।
खान ने 2008 में एसएचआरसी के समक्ष एक याचिका दायर की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उनके बेटे इरशाद अहमद खान को सेना ने 2004 में श्रीनगर के सेना मुख्यालय में जीओसी 15 कोर में बुलाया था और हिरासत में रखा था और उसके बाद से उनके बेटे को रिहा नहीं किया गया और न ही उसके बारे में कोई जानकारी मिली।
शिकायत पर आयोग ने तत्कालीन राज्य सरकार को 4 जुलाई 2008 के सरकारी आदेश के तहत रोजगार के अलावा इरशाद के निकटतम परिजन के पक्ष में 1 लाख रुपये की अनुग्रह राशि मंजूर करने की सिफारिश की। हालांकि सरकार ने 7 अगस्त 2014 को एक संचार में आयोग की सिफारिशों को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता मोहम्मद अमीन खान ने अदालत के समक्ष इसे चुनौती दी थी। हालांकि अदालत ने याचिका खारिज कर दी।