अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव में किसका मंगल होगा...भाजपा का, जो जम्मू-कश्मीर में सत्ता के लिए दशकों से इंतजार कर रही है? या नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन का, जो एक दशक से सत्ता से बाहर है। गठबंधन सरकारों से राज्य को मुक्ति मिलेगी या नंबर गेम में महबूबा मुफ्ती की पीडीपी, इंजीनियर रशीद की अवामी इत्तेहाद पार्टी और जमात व निर्दलीयों की भूमिका बढ़ जाएगी? जोड़-तोड़, मोलतोल और तिकड़मबाजी से छुटकारा मिलेगा, या राज्य इसी जकड़न में कस जाएगा? मंगलवार को ईवीएम खुलते ही इन सवालों के जवाब मिल जाएंगे।
नेशनल कॉन्फ्रेंस : अब्दुल्ला परिवार से 7वीं बार मुख्यमंत्री या नया समीकरण
प्रदेश में अब तक 10 विधानसभा चुनावों में 13 मुख्यमंत्री हुए हैं। इनमें छह बार मुख्यमंत्री अब्दुल्ला परिवार से रहे। इनमें दो बार शेख अब्दुल्ला, तीन बार फारुक अब्दुल्ला और 2009 में एक बार उमर अब्दुल्ला सीएम बने। एनसी राज्य की, खासकर घाटी की सबसे ताकतवर पार्टी मानी जाती रही है। हालांकि बीते कुछ सालों में इसके आधार में कमी आई है। जम्मू संभाग में कमजोर आधार की वजह से एनसी शुरू से ही कांग्रेस पर निर्भर रही है। इस चुनाव में भी वह कांग्रेस से गठबंधन कर मैदान में उतरी। इसके बावजूद दोनों में समन्वय की कमी नजर आई। पांच सीटों पर दोनों पार्टियां घोषित रूप से दोस्ताना मुकाबले में उतरीं।
कांग्रेस : गठबंधन कितना आया काम
कांग्रेस से दो बार गुलाम मो. सादिक और एक बार गुलाम नबी आजाद सीएम रह चुके हैं। इसके बाद कांग्रेस कभी अकेले सत्ता हासिल नहीं कर सकी। दोबारा मुख्यमंत्री भी गठबंधन की वजह से बना सकी थी। कभी एनसी व कभी पीडीपी के साथ मिलकर कांग्रेस राज्य में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने में जुटी रही। 2002 में पीडीपी संग गठबंधन कर 26.17% व 2008 में एनसी के साथ मिलकर 19.93%वोट शेयर बनाया। कांग्रेस 2014 में अकेले लड़ी और 18.36% वोट ही हासिल कर पाई। नतीजे बताएंगे कि पुराने मित्र के साथ यह नया रिश्ता कितना काम आया?
पीडीपी : किंगमेकर बनेगी या किनारे रहेगी
पीडीपी ने यह चुनाव किंग बनने की जगह किंगमेकर बनने के लक्ष्य के साथ लड़ा। महबूबा मुफ्ती ने आश्चर्यजनक ढंग से चुनाव नहीं लड़ा, जिससे पार्टी सीएम रेस से ही बाहर हो गई। पार्टी घाटी में एनसी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में अपने को पेश करने में ही लगी रही। चुनाव की मुख्य प्रचारक तो मुफ्ती थीं, लेकिन मुख्य चेहरे के रूप में मुफ्ती की बेटी इल्तिजा देखी गई। नतीजों से पता चलेगा कि तीन बार सत्ता सिंहासन तक पहुंची पार्टी कहां खड़ी रह पाई है? क्या वह घाटी में एनसी की प्रतिस्पर्धी अभी भी बनी रह पाई है या उसकी जगह उभरी नई पार्टियों ने ले ली है? यह भी पता चलेगा कि चुनाव से ठीक पहले वाले सीएम ने सीएम की कुर्सी को छोड़ने की जो रणनीति अपनाई, क्या वह सफल रही? क्या वह किंग की जगह किंगमेकर बनने में सफल हो पाईं? ऐसा हुआ तो इल्तिजा इस परिवार की नई सितारा होकर सामने आ सकती है।