जम्मू-कश्मीर में आप क्या बदलाव महसूस करते हैं?
अगस्त, 2019 में लोगों की इच्छा की परवाह किए बिना जम्मू-कश्मीर को दो भागों में तोड़ दिया गया। एक राज्य से घटाकर केंद्रशासित प्रदेश बना दिया। लोगों ने 35ए के तहत दी गई भूमि, नौकरियों और संसाधनों पर सुरक्षा का अधिकार खो दिया। विभाजन से लोग अपनी पहचान खोने से डरते हैं। लोगों पर जबरदस्ती की गई और निगरानी बढ़ा दी गई। इसमें गिरफ्तारी, पीएसए व यूपीए लगाने से लेकर सरकारी सेवा से बर्खास्तगी, कुर्की, सोशल मीडिया पर प्रतिबंध नागरिकों की स्वतंत्रता का दमन शामिल है। प्रत्यक्ष रूप से उथल-पुथल भले कम हो गई, लेकिन जबरदस्ती और सत्तावादी परिवर्तनों के प्रति मजबूत अव्यक्त प्रतिरोध अब भी है।
हुर्रियत के कई नेता चुनाव में भाग ले रहे हैं। क्या आप कभी चुनाव लड़ेंगे?
हुर्रियत चुनावों के खिलाफ नहीं है। चुनाव संघर्ष के समाधान का साधन नहीं हो सकते। ये दो अलग-अलग मामले हैं। इन्हें समझने की जरूरत है। मैं इस राजनीतिक और मानवीय मुद्दे के समाधान में भूमिका निभाना चाहता हूं। लेकिन, इसमें मुझे चुनावी राजनीति से मदद मिलती नहीं दिखती है। समाधान के लिए लोगों की सहभागिता और विचार-विमर्श की जरूरत है। दबाव या हिंसा के बजाय शांति और सहयोग के माध्यम से ही समाधान संभव है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। कश्मीर विवाद का शांतिपूर्ण तरीके से समाधान तलाशने के क्षेत्र में हुर्रियत की कोशिशें जारी रहेगी।
आप मानते हैं कि कई मुद्दे हैं, जिन्हें हल करने की जरूरत है। आपके पास उन्हें हल करने का क्या फॉर्मूला है?
हम इस मुद्दे को हमेशा के लिए सुलझाने के इच्छुक हैं। फैसला नई दिल्ली को लेना होगा। हमारे पास पहले से ही अटल बिहारी और मनमोहन सिंह के समय से बातचीत की पिछली रूपरेखा मौजूद है। भारत में लोगों को यह समझने की जरूरत है कि संघर्ष हमें सबसे अधिक प्रभावित करता है। हमने हजारों लोगों को खो दिया। हजारों लोग जेलों में बंद हैं। यह 1947 से नियंत्रण रेखा के पार विभाजित परिवारों के दर्द के बारे में है, तो 1990 के बाद पलायन करने वाले कश्मीरी पंडित की पीड़ा के बारे में भी है। यह मानवीय व राजनीतिक मुद्दा है। हम सभी को मिलकर काम करना होगा।
नतीजे आठ को आएंगे। आप क्या चाहते हैं कि नई सरकार कैसे और क्या काम करे?
जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम और इसमें हाल के संशोधनों ने केंद्र की ओर से नियुक्त उपराज्यपाल को व्यापक कार्यकारी शक्तियां प्रदान की हैं। निर्वाचित विधायिका को लगभग शक्तिहीन बना दिया है। इसलिए नहीं पता कि नई सरकार इन परिस्थितियों में कितनी प्रभावी होगी। सत्ता में कोई भी आए, उनका ध्यान लोगों के लिए भूमि, नौकरियों और संसाधनों के अधिकार को बहाल करने पर होना चाहिए। 370 बहाल होना चाहिए। जेलों में बंद राजनीतिक कैदियों और युवाओं को रिहा किया जाना चाहिए