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कारगिल गाथा: गोलियों की बौछार से बेपरवाह रस्सियों से चढ़ाई कर जीत ली टाइगर हिल

Tue, 05 Jul 2016 01:02 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू
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4 जुलाई 1999 कारगिल युद्ध में हार और जीत को तय करने वाले सबसे अहम पड़ाव टाइगर हिल शौर्य की अनूठी मिसाल की गवाह बनी। ऊंचाई पर बंकर बनाए बैठे दुश्मन तक पहुंचने के लिए रस्सी से चढ़ना था।
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18 ग्रेनेडियर की घातक टीम को इसका जिम्मा मिला। योगेंद्र सिंह यादव ने स्वैच्छिक रूप से प्लाटून को चोटी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी ली। चोटी पर रस्सी फंसाने के बाद वह अपनी टीम के साथ चढ़ाई कर रहे थे तो दुश्मन ने गोलियों की बौछार कर तीन साथियों को शहीद कर दिया। 

बुरी तरह से घायल योगेंद्र ने चढ़ाई जारी रखी। करीब चार बजे ऊपर पहुंचते ही घायल योगेंद्र क्रालिंग से दुश्मन के बंकर तक पहुंचे और ग्रेनेड से चार दुश्मन ढेर कर दिए। घायल योगेंद्र को सुरक्षित निकालने को कहा गया लेकिन वे नहीं माने। 
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टाइगर हिल जीतकर तोड़ी थी पाक की हिम्मत

- फोटो : ADGPI
खून से लथपथ योगेंद्र ने दूसरा बंकर उड़ाकर दुश्मन की फायरिंग को पूरी तरह से शांत कर दिया। घातक प्लाटून के असाधारण शौर्य प्रदर्शन से टाइगर हिल पर फतह मिल गई। ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव को अदम्य साहस के लिए परमवीर चक्र का सम्मान दिया गया।

कारगिल युद्ध में 4 जुलाई को टाइगर हिल पर भारतीय सेना के कब्जे से पाक की हिम्मत टूट गई थी। पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ मदद मांगने अमेरिका जा पहुंचे लेकिन अमेरिका ने इनकार कर दिया। हार से घबराए शरीफ ने पांच जुलाई को पाक सेना हटाए जाने का बयान दिया जिससे पाकिस्तानी फौज का मनोबल टूट गया।
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नौवीं पढ़ते ही सेना में भर्ती हो गए थे उदयमान 

उदयमान सिंह - फोटो : Amar Ujala
बेटे की शहादत को सत्रह बरस बीत गए हैं, लेकिन साथियों से सुनी उनकी वीरता की कहानी आज भी जेहन में ताजगी के साथ घूमती है। टाइगर हिल फतह करने के लिए 18 ग्रेनेडियर की घातक प्लाटून में शामिल 18 बरस के नौजवान उदयमान सिंह छोटी सी उम्र में ही शहीद हो गए थे। 

जम्मू शहर से सटे शामाचक के रहने वाले उदयमान सिंह के पिता ओमकार सिंह और मां कांता देवी इस बार भी आज मंगलवार को बेटे का शहीदी दिवस मना रहे हैं। पिता ओमकार सिंह ने बताया कि उदयमान नौवीं कक्षा में पढ़ रहा था। जबलपुर में चाचा के पास गया तो सेना में भर्ती होने के लिए जिद पर अड़ गया। 

कारगिल युद्ध में टाइगर हिल फतह करने के लिए 18 ग्रेनेडियर को जिम्मा मिला था। उदममान और मदन लाल रस्सी के सहारे चोटी पर पहुंचे थे और कई दुश्मनों को ढेर कर शहीद हो गए। शहादत 5 जुलाई को हुई, लेकिन इन दोनों के शव 9 जुलाई को मिले थे। ओमकार सिंह ने बताया कि उनकी दो बेटियों का एक ही भाई था जो देश पर कुर्बान हो गया। उसे सेना मेडल का सम्मान मिला।
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