जम्मू। जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी ने दो दिवसीय हिंदी सम्मेलन करवाया। इस दौरान साहित्यकारों ने पत्रवाचन किया। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में हिंदी साहित्य के विषयों पर पेपर पढ़े। इस दौरान सभी साहित्यकारों व अन्य श्रोताओं ने पत्रवाचकों की अभिव्यक्ति की तारीफ की और उन्हें सुझाव भी दिया। वहीं साहित्यकारों के बीच पत्र वाचन में रही कमियों को दूर करने के बारे में विचार-विमर्श और बहस हुई। शिक्षा रानी, पवन खजूरिया और डॉ. कृष्ण ने पत्र वाचन किया। आलोचना के दौरान पत्रवाचकों को कई सुझाव दिए गए। डोगरी के संपादक डॉ. रत्न बसोत्रा ने कहा कि शोध पत्र लिखना आसान काम नहीं है। जो लोग खुद नहीं लिखते उन्हें दूसरों पर उंगली उठाने का कोई अधिकार नहीं। किसी के गुणों दोषों का मूल्यांकन वहीं व्यक्ति कर सकता है। जो खुद सृजन करता है। कार्यक्रम के अध्यक्ष साहित्यकार अशोक ने कहा कि तीनों पत्रवाचकों ने शानदार प्रस्तुति दी है। शिक्षा रानी ने कश्मीर के संदर्भ में राजतरंगिनी को उद्धत किया है। पवन खजूरिया ने भारतीय परंपरा में नाटकों में ऐतिहासिक पात्रों की खोज की। उन्होंने कहा कि सावित्री जैसा पात्र ऐतिहासिक है। इसके अलावा अशोक ने कहा कि हिंदी के लेखकों को गंभीर लेखन की ओर बढ़ने की जरूरत है। उच्च कोटि के लेखकों को चाहिए कि हिंदी साहित्य की प्रवृत्तियों को समझें। प्रोफेसर राजकुमार ने कहा कि जिस व्यक्ति ने साहित्य को अपनी दो सांसें दी हैं। आलोचक व पाठक को चाहिए कि उस व्यक्ति का नाम न छूटे। स्थानीय कवियों ने कविताएं पढ़कर श्रोताओं का मन जीता।मौके पर कल्चरल अकेडमी में हिंदी की कार्यकारी संपादक रीटू खड़याल, यशपाल निर्मल , अग्निशेखर और जम्मू व कश्मीर दोनों संभागों से साहित्यकार उपस्थित रहे।