- कंबल बुनाई की विरासत बचाने के लिए संघर्ष कर रहे दर्द-शिना के कारीगर
- समुदाय ने सरकार से मान्यता और पंजीकरण की लगाई गुहार
फिरदौस अहमद
गांदरबल। मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले में दर्द-शिना समुदाय के कंबल बुनाई के कारीगर विरासत बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। सरकारी अनदेखी के चलते करघा उद्योग संकट से जूझ रहा है। इससे पारंपरिक कारीगरों के लिए रोजगार का संकट खड़ा हो गया है।
गुरेज के जौदारा गांव से ताल्लुक रखने वाली दर्द-शिना जनजाति कई पीढ़ियों से पारंपरिक कंबल, शॉल, ऊनी टोपी और मोजे तैयार करती आ रही है। वर्ष 2005 में आए हिमस्खलन के कारण इन्हें पुश्तैनी गांव छोड़ना पड़ा और ये लोग गांदरबल जिले के छत्रगुल बाला गांव में आकर बस गए।
70 वर्षीय कारीगर गुलाम मोहम्मद ने बताया, यह कला पीढ़ियों से चली आ रही है। फिर भी हमें हस्तशिल्प विभाग की ओर से मान्यता या पंजीकरण नहीं दिया गया है। जबकि अन्य कारीगरों को यह सहायता मिलती है।
मेहनत ज्यादा, आय कम
परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण
गुलाम मोहम्मद ने बताया की कंबल बुनाई का सारा काम हाथ से किया जाता है। पहले हम भेड़ों से ऊन काटते हैं, उसे धोते हैं और कंघी से साफ करते हैं। फिर उसे करघे पर बुनने से पहले महीन धागे में पिरोते हैं। यह एक पारिवारिक प्रयास है, जिसमें महिलाएं कताई करती हैं और पुरुष बुनाई करते हैं। इतनी मेहनत के बावजूद आय बहुत कम है, और परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण हैं। उन्होंने कहा, हम अक्सर बिजली के बिना दिन-रात काम करते हैं। अगर सरकार सोलर लाइट का प्रबंध करे तो बहुत मदद मिलेगी। हमें अधिकारियों से मान्यता और समर्थन की जरूरत है।
बेरोजगारी के कारण युवा भी
पुश्तैनी पेशे को ही अपना रहे
एक अन्य कारीगर मोहम्मद अफजल खान वित्तीय संघर्षों पर मोहम्मद की भावनाओं को दोहराते हैं। उन्होंने कहा, दशकों के समर्पण के बावजूद हमारी आय बहुत कम है। पंजीकरण हमें बहुत जरूरी लाभ प्रदान कर सकता है। युवा पीढ़ी भी सीमित रोजगार अवसरों के कारण अनिच्छा से इस शिल्प को अपनाती है। जहूर अहमद लोन ने बताया कि बेरोजगारी ने मुझे इस पुश्तैनी पेशे की ओर धकेल दिया। समुदाय ने सरकार से सहायता की गुहार लगाई है। उन्होंने कहा, हमें अन्य हस्तशिल्प क्षेत्रों की तरह मान्यता और वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए।