संवाद न्यूज एजेंसी
जम्मू। डोगरी साहित्य का सितारा सोमवार को अस्त हो गया। डोगरी साहित्य को नया मोड़ देने वाले ज्ञानेश्वर शर्मा नहीं रहे। साहित्य से जुड़े लोग ज्ञानेश्वर शर्मा के जाने को डोगरी साहित्य के एक सुनहरे काल का अंत मानते हैं। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने शोक जताते हुए कहा है - ज्ञानेश्वर शर्मा का जाना जम्मू कश्मीर के साहित्य के लिए ऐसा है कि एक खाली पन्ना जो कभी भरा नहीं जा सकता। वे पीछे अपने काम की ऐसी छाप छोड़ गए हैं, जो आने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन करती रहेगी।
ज्ञानेश्वर शर्मा का जन्म 1947 में परमंडल में हुआ। उन्हें डोगरी साहित्य का कद्दावर साहित्यकार, गीतकार व कवि माना गया है। साहित्यकार के साथ पेशे से इंजीनियर थे और क्रिकेट खेलने का शौक था। 1973 में डोगरी में लिखना शुरू किया। पेशे में रहते हुए भी 13 किताबें लिखीं। जम्मू कश्मीर कल्चर अकादमी, जम्मू कश्मीर रियासती पुरस्कार और रियासत की तरफ से कई पुरस्कार मिले। इसके अलावा दो बार साहित्य अकादमी पुरस्कार 1996 में बद्दली कलावे दी कविता संग्रह और 2012 में बाल उपन्यास फ्ही केह होआ के लिए मिला। डोगरी संस्था के साहित्यकारों के अनुसार ज्ञानेश्वर शर्मा की कमी साहित्य जगत में कभी भी पूरी नहीं हो पाएगी।