भीड़, लंबी कतार, असमंजस और इंतजार... ऐसे हालात सरकारी मेडिकल कॉलेज व अस्पताल (जीएमसी) जम्मू में रात को हो जाते हैं। कोई ही ऐसा दिन या समय होगा जब इन तकलीफों से छुटकारा मिला हो। पहले से बीमार व्यक्ति यहां आकर अव्यवस्था का मरीज बन जाता है। तीमारदार भी भटकते हुए हर किसी से पर्ची पर लिखे टेस्ट या वार्ड के बारे में पूछ रहे हैं। चिकित्सक कम और मेडिकल स्टूडेंट्स ज्यादा हैं।
हाथ में ग्लूकोज की बोतल पकड़ने की पीड़ा थोड़ी सी दूर हुई है, लेकिन अभी भी बीच-बीच में हो रही है। एक से दूसरे वार्ड में मरीज को ले जाने के लिए तीमारदार खुद ही स्ट्रेचर को संभाल रहे हैं। सोशल वर्करों का कैबिन खाली है। इमरजेंसी में एक बेड पर तीन-तीन मरीजों का इलाज चल रहा है। कोई एक घंटे से इलाज के लिए तड़प रहा है तो कोई सैंपलों की सूची पकड़कर टेस्ट के लिए ठोकरें खा रहा है। पूछने पर कहता है कि चिकित्सक ने टेस्ट लिख दिए, पर यह नहीं बताया कि कौन से हैं और इसके लिए कहां जाना है। यह खुलासा तीन घंटे की पड़ताल में हुआ जब संवाददाता की ओर से बुधवार देर रात 12 से तीन बजे तक अस्पताल के अलग-अलग वार्डों का दौरा किया गया।
प्रवेश द्वार से ही दिक्कतों के द्वार खुलते हुए नजर आए। हालांकि प्रिंसिपल का अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहे डॉ. आशुतोष गुप्ता के प्रबंधन में कुछ सुधार आया है, मगर अभी व्यवस्था पूरी तरह से पटरी पर नहीं लौटी है।
यह रिपोर्ट दिखाने का समय नहीं है...
इमरजेंसी वार्ड में एक तरफ स्ट्रेचर पर मरीज इलाज के लिए इंतजार कर रहे हैं तो वहीं चिकित्सकों के कमरे के बाहर लंबी कतार लगी है। अंदर बैठे मेडिकल स्टूडेंट्स मरीजों का चेकअप कर रहे हैं। फाइल पर टेस्ट लिख रहे हैं। मरीज को देखने के लिए एक मिनट भी ज्यादा लग रहा है। इसी बीच एक तीमारदार आ जाता है, जिसे सुरक्षा गार्ड की ओर से अंदर जाने नहीं दिया जाता। तर्क दिया जाता है कि ये रिपोर्ट चेक करवाने का समय नहीं है। इस पर तीमारदार पूछता है कि फिर कितने बजे होगी। जवाब मिलता है कि अभी नहीं। इसके बाद तीमारदार इमरजेंसी वार्ड के बाहर चिंतित मुद्रा में खड़ा हो जाता है। पूछने पर जंतरण ईशाद बताता है कि नगरोटा से साढ़े 9 बजे पड़ोसी तिकेश्वर के साथ उनकी पत्नी गोदारी को लेकर आए। अब जांच के लिए वार्ड-12 से वार्ड-2 में भेजा, लेकिन पता नहीं चल रहा है कि वह कहां है। चिकित्सक से भी मिलने नहीं दिया जा रहा।
इमरजेंसी है, जाने दो
लंबी कतार के बीच एक महिला सुरक्षा गार्ड से विनती कर रही है। कह रही है कि इमरजेंसी है, इसलिए अंदर जाने दो। मगर जवाब मिलता है कि यहां हर किसी को इमरजेंसी है। चेकअप करवाने के लिए सभी लाइन में लगे हैं, इसलिए आप खुद स्ट्रेचर पर मरीज को लेकर आ जाओ। बाद में चिकित्सक इलाज कर देंगे। इसके बाद महिला स्ट्रेचर लेने चली जाती है। मगर अपने बारे में कुछ नहीं बताती।
बेड खाली, जगह नहीं
सैनिक कॉलोनी में घरेलू झगड़े में घायल होकर पहुंची मंजू को ट्रॉमा वार्ड से अन्य में शिफ्ट किया गया। उनकी बहन अंजू हाथ में ग्लूकोज की बोतल लेकर स्ट्रेचर को ले जा रही थी। जगह नहीं मिलने पर फिर वापस आ गईं और इमरजेंसी में बाहर मरीज के साथ लेट गईं। हालांकि पास ही वार्ड में एक बेड खाली पड़ा था।
एक बेड व मरीज तीन
नर्सिंग रूम के बाहर इमरजेंसी में एक बेड में तीन मरीजों का इलाज चल रहा है। एक के ग्लूकोज की बोतल लगी है। दूसरे को टीका लगाया जा रहा है और तीसरा बैठा है। नर्स बारी-बारी इलाज कर रही हैं, लेकिन तबीयत ज्यादा खराब होने के कारण मरीजों को नींद आ रही है। बमुश्किल किसी तरह खुद को संभाल रहे हैं।
चेकअप के लिए हाथ में ग्लूकोज
इमरजेंसी से आई मरीज के साथ महिला तीमारदार हाथ में ग्लूकोज की बोतल लेकर चल रही थी। उन्होंने बताया कि रूम नंबर 2 में चिकित्सकों के पास भेजा है। जब पूछा कि क्या चिकित्सक चेकअप के लिए नहीं आते तो नाम न छापने की शर्त पर कहती हैं-इलाज तो हो रहा है, लेकिन चिकित्सक के पास खुद जाना पड़ रहा है।
एक घंटे तक स्ट्रेचर पर तड़पा
हादसे में हरि प्रसाद घायल हो गए। उन्हें पौने 12 बजे अस्पताल में लाया। ट्रॉमा रूम से कुछ कदम दूर स्ट्रेचर पर लेटे वह कांप रहे थे। तीमारदार श्रीराम ने बताया कि कबीर कॉलोनी में रहते हैं। यहां पर ठोकर खाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। करीब एक घंटे से इलाज नहीं मिल पाया। चिकित्सक की ओर से हाल तक जाना नहीं गया।
काले चश्मे में कई राज
काला चश्मा पहनी नर्स मरीजों की जांच कर रही हैं। पता चला है कि उन्हें आई फ्लू है, मगर आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हुई। अगर वह खुद बीमार हैं तो उन्हें आराम की जरूरत है। नर्स बारी-बारी मरीजों का हाल-चाल जान रही हैं। दूसरी ओर, काले चश्मे में पुलिस का कर्मचारी गश्त कर रहा है। उनके साथी ने बताया कि पता नहीं क्यों चश्मा लगाया है। मगर यह साफ है कि दोनों कर्मी आई फ्लू से बचने के लिए ऐसा कर रहे हैं या खुद पीड़ित हैं।
मरीजों की सुविधा के लिए हर तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। पार्किंग की परेशानी से निजात दिलाने के लिए योजना तैयार कर ली है। कुछ दिन में सोशल वर्करों की कमी दूर कर ली जाएगी। जल्द वरिष्ठ चिकित्सकों की देखरेख में इलाज होगा। मरीजों व साथ आए तीमारदारों को किसी प्रकार की दिक्कत नहीं आने दी जाएगी। -डॉ. आशुतोष गुप्ता, प्रिंसिपल