यह पहला मौका रहा जब घाटी में बहिष्कार के नारे नहीं गूंजे। कारण, हुर्रियत बिखर गई है। उसके कई नेता या तो जेल में हैं, या नजरबंद। वहीं, कुछ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शािमल होकर मुख्यधारा की राजनीित में उतर गए। इस बार कई हुर्रियत नेता जेल से चुनाव लड़ रहे हैं।
घाटी में चुनाव का दूसरा चरण संपन्न हो गया। यह पहला मौका रहा जब घाटी में बहिष्कार के नारे नहीं गूंजे। कारण, हुर्रियत बिखर गई है। उसके कई नेता या तो जेल में हैं, या नजरबंद। वहीं, कुछ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शािमल होकर मुख्यधारा की राजनीित में उतर गए। इस बार कई हुर्रियत नेता जेल से चुनाव लड़ रहे हैं।
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वर्ष 1987 के बाद पहला मौका है जब हुर्रियत के नेता वोट मांग रहे हैं। अब तक सिर्फ मतदान का विरोध ही इनका एजेंडा था। कश्मीर की राजनीति में कभी सक्रिय रही ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का असर अनुच्छेद 370 निरस्त होने के बाद घटा है। कभी अलगाववाद की अावाज बुलंद करने वाले हुर्रियत नेता सैयद सलीम गिलानी पीडीपी से चुनाव मैदान में हैं। इसी तरह प्रमुख हुर्रियत नेता सरजन बरकती जेल से चुनाव लड़ रहा है। 17 साल की बेटी सुगरा उसके लिए प्रचार कर रही है। सरजन बरकती वही है, जिसने आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद दक्षिण कश्मीर में हिंंसक आंदोलन चलाया था। अब वह उमर अब्दुल्ला के खिलाफ चुनाव मैदान में है।
1993 में बनी थी हुर्रियत
1987 के चुनाव परिणाम में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट को केवल 4 सीटें मिलीं। फारूक अब्दुल्ला ने सरकार बनाई। चुनाव में धांधली का आरोप लगाकर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। 13 जुलाई 1993 को ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की नींव पड़ी। इसका उद्देश्य घाटी में अलगाववादी आंदोलन को गति देना, पाकिस्तान परस्ती व आजादी के लिए जनमत संग्रह का प्रयास करना रहा।