सद्भाव की तस्वीर.. हिंदू और मुस्लिम कारीगर मिलकर तैयार कर रहे हैं रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। दशहरे को लेकर तैयारियां तेज हैं। शहर में सबसे बड़ा आयोजन परेड मैदान और गांधीनगर की दशहरा ग्राउंड में होगा, जहां 50 से 60 फुट के पुतले आकर्षण का केंद्र बनेंगे। वहीं, पुंछ, राजोरी, अखनूर व अन्य क्षेत्रों में पुतलों की ऊंचाई 25-30 फुट होगी। कश्मीर से लेकर लद्दाख तक जलने वाले रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जम्मू में बनाए जा रहे हैं, जिसमें आपसी भाईचारे और सद्भाव की तस्वीर देखने को मिल रही है। पुतलों का निर्माण 50 कारीगर कर रहे हैं, जिसमें हिंदुओं के साथ मुस्लिम भी हैं। सभी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के हैं। ससुर और दामाद की जोड़ी भी पुतलों काे आकार देने में लगी है। गांव मेनापुठी (सरदाना तहसील) के मोहम्मद रेहान अपने दामाद मोहम्मद ग्यासुद्दीन के साथ 1985 से पुतले बना रहे हैं।
परेड के गीता भवन में काम कर रहे मोहम्मद रेहान ने बताया कि असम से पोर और चवाड़ किस्म के बांस मंगवाए हैं। मेरठ से वेस्ट पेपर, दिल्ली से पुराने कपड़े, सेबा, पेंट आदि आया है। इससे दशानन का 60 और मेघनाद व कुंभकर्ण के 50-55 फुट के पुतलों को बनाया जाएगा। रावण की मूंछ तीन मीटर लंबी होगी। इस बार रावण के कान के बालों को पटाखे का रूप दिया जाएगा। श्री सनातन धर्म सभा गीता भवन के निमंत्रण पर हर साल कारीगर पुतले बनाने आते हैं। 38 वर्षों से जम्मू में पुतलों का निर्माण किया जा रहा है। आरएस पुरा, बिश्नाह, रेलवे स्टेशन जम्मू, छन्नी हिम्मत और सैनिक कॉलोनी में कार्यक्रम के लिए भी पुतलों का काम धर्म और जाति से परे होकर कारीगर कर रहे हैं। हिंदू कारीगरों में हरिजन और कश्यप ठाकुर शामिल हैं। उन्होंने कहा कि सभी साथ खाना खाने के बाद काम में जुट जाते हैं। मजहब इंसानियत की सीख देता है।
पर्व में विघ्न दूर करने के लिए एक कारीगर रहता है मौजूद
मोहम्मद रेहान बताते हैं कि पर्व में विघ्न पैदा न हो इसके लिए एक कारीगर को पुतले दहन होने तक भेजा जाता है। यह व्यवसाय धर्म और जातपात से जुड़ा नहीं है। यहां ऐसे कई हिंदू और मुस्लिम कारीगर हैं जो साल से काम कर रहे हैं। मोहम्मद ग्यासुद्दीन ने कहा कि जब हमारे पुतलों का दहन होता है तो ऐसा महसूस होता है जैसे पुरस्कार मिल गया हो। बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व दशहरा देश में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे का भी उदाहरण है।