- जीएडी, वित्त, पीडब्ल्यूडी के सचिव शामिल, एक वर्ष से हाईकोर्ट का आदेश नहीं माना
- हाईकोर्ट की टिप्पणी: प्रदेश में न्याय व्यवस्था को सरकार ने मजाक बना दिया
जम्मू। डीसी गांदरबल के बाद अब प्रदेश के मुख्य सचिव और तीन सचिव हाईकोर्ट में तलब किए हैं। अवमानना मामले में जीएडी, पीडब्ल्यूडी आरएंडबी, वित्त सचिव को एक वर्ष पहले जारी आदेश का पालन न करने पर व्यक्तिगत तौर पर पेश होने का आदेश दिया है।
न्यायाधीश अतुल श्रीधरन एवं जावेद इकबाल वानी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि प्रदेश में न्याय व्यवस्था को एक क्रूर मजाक बना दिया है। हाईकोर्ट ने कहा, आदेशों का पालन न करना नौकरशाहों की आदत बन गई है। जिससे छह हजार अवमानना याचिकाओं का बैकलॉग हो गया है।
खंडपीठ द्वारा पारित यह आदेश वेतनमान के मामले में मुख्य अभियंताओं को अधीक्षण अभियंताओं के बराबर रखने के सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका से उत्पन्न हुआ था। अदालत ने पहले अधिकारियों को तीन महीने के भीतर विसंगति को दूर करने का निर्देश दिया था। हालांकि स्पष्ट आदेश के बावजूद सरकार न केवल अनुपालन करने में विफल रही, बल्कि उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर करने में भी देरी की। अदालत ने पाया कि एसएलपी केवल दस महीने बाद दायर की गई थी और तब भी सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री द्वारा बताई गई सात कमियों को ठीक नहीं किया गया।
खंडपीठ ने इस बात पर भी आक्रोश जताया कि मुख्य सचिव एक बैठक का हवाला देते हुए निर्देशानुसार अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं हुए। इसने अदालत को कानून सचिव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित किया, जिन्होंने दावा किया कि मुख्य सचिव एक बैठक में व्यस्त थे और एडवोकेट जनरल जिन्होंने पहले अदालत को सूचित किया था कि मुख्य सचिव कार्यवाही में शामिल होने के इच्छुक थे, लेकिन कनेक्टिविटी की समस्याओं का सामना कर रहे थे। ये दोनों संस्करण बिल्कुल अलग-अलग हैं और एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। मामले में अगली सुनवाई आठ अगस्त, 2024 के लिए तय की है। इसमें मुख्य सचिव सहित सभी चार अवमाननकर्ताओं को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया। चेतावनी दी कि गैर-अनुपालन से उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बलपूर्वक उपाय किए जाएंगे। जेएनएफ
-
छह हजार अवमानना याचिकाओं का बैकलाग
खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अतीत में कार्यपालिका को दिखाए गए अत्यधिक उदारता ने उसे लगातार अदालत के आदेशों की अनदेखी करने के लिए प्रोत्साहित किया है। इसके कारण छह हजार से अधिक अवमानना याचिकाओं का बैकलॉग हो गया है, जिनमें से कुछ मामले एक दशक से अधिक समय से लंबित हैं। आदर्श रूप से एक अवमानना मामले को तीन से पांच सुनवाई में समाप्त किया जाना चाहिए जिसमें आदेश का अनुपालन किया जाता है। यह एक चौंकाने वाला परिदृश्य दर्शाता है, जहां कार्यपालिका इस न्यायालय द्वारा पारित आदेशों की लगातार घोर अवमानना के साथ अनदेखी कर रही है।
-
बर्दाश्त नहीं होगी ऐसी अनदेखी
खंडपीठ ने चेतावनी दी कि वह अपने आदेशों के लिए इस तरह की घोर अवहेलना को अब और बर्दाश्त नहीं करेगी। अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए त्वरित उपाय करेगी, ताकि नौकरशाही को सतर्क किया जा सके। न्यायालय के आदेशों के साथ अब तक जो कुछ भी हो रहा है। उसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। एक बार आदेश पारित हो जाने के बाद इसका पालन किया जाना चाहिए।