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न्यायिक प्रक्रिया उत्पीड़न का साधन नहीं होनी चाहिए : हाईकोर्ट

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हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश एंटी करप्शन ब्यूरो के आदेश को किया रद्द
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जम्मू। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायाधीश विनोद चटर्जी कौल ने विशेष न्यायाधीश एंटी करप्शन ब्यूरो के आदेश को रद्द कर दिया है। जिसके तहत विशेष न्यायाधीश एंटी करप्शन ने एफआईआर पर क्लोजर रिपोर्ट वापस कर दी थी। इस पर जम्मू-कश्मीर पीसी अधिनियम की धारा 5(1)(डी), 5(2) और धारा 120-बी आरपीसी के तहत मामला दर्ज किया गया था। हाईकोर्ट ने तर्क दिया कि निस्संदेह न्यायिक प्रक्रिया उत्पीड़न या अनावश्यक उत्पीड़न का साधन नहीं होनी चाहिए। कोर्ट को विवेक का प्रयोग करने में सतर्क और विवेकपूर्ण होना चाहिए। किसी मामले में प्रक्रिया जारी करने या आगे बढ़ने से पहले सभी प्रासंगिक तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए। ऐसा न हो कि व्यक्तियों को अनावश्यक रूप से परेशान करने के लिए प्रतिशोध के रूप में शिकायतकर्ता के हाथ में एक साधन बन जाएगा।
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आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत दायर इस याचिका के माध्यम से याचिकाकर्ता विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निरोधक) जम्मू द्वारा 23 अक्तूृबर 2019 को पारित आदेश को रद्द करने की मांग की। 18 साल से अधिक की देरी के बाद एक शिकायत पर विचार किया गया है। जेएंडके पीसी अधिनियम की धारा 5(1)(डी), 5(2) और आरपीसी की धारा 120-बी के तहत एफआईआर संख्या 09-2014 में प्रो. एसके भल्ला की शिकायत पर दर्ज की गई। तत्कालीन पुलिस स्टेशन सतर्कता संगठन, जम्मू, अब एंटीकरप्शन ब्यूरो (एसीबी) द्वारा दर्ज किया गया। बाद में मामले में कुछ निष्पक्ष नहीं निकला। न्यायमूर्ति विनोद चटर्जी कौल ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि यदि पुलिस ने गहन जांच के बाद क्लोजर रिपोर्ट दायर की है, तो इस अदालत की सुविचारित राय है कि ट्रायल कोर्ट क्लोजर रिपोर्ट में दिए गए व्यापक तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए कि जब विवादित म्यूटेशन को सत्यापित किया गया था तब याचिकाकर्ता सेवा में नहीं थे, आगे की जांच के लिए लगाए गए आदेश के संदर्भ में निर्देश दिया गया है, जो संक्षेप में और मूल रूप से नए सिरे से जांच के लिए एक निर्देश है। इसलिए, ट्रायल कोर्ट ने पुलिस द्वारा दायर क्लोजर रिपोर्ट को खारिज पूरी से नहीं किया। आक्षेपित आदेश को स्पष्ट रूप से पढ़ने और अवलोकन करने पर यह पता चलता है और सुझाव दिया जाता है कि ट्रायल कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से परे काम किया। इन्हीं तर्कों पर आदेश को रद्द करने का फैसला सुनाया। जेएनएफ
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