प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में मंगलवार देर रात से शुरू हुई भारी बारिश बुधवार को भी जारी रही। दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के देवसर के दर्देगुंड क्षेत्र की ऊपरी पहाड़ियों में बादल फटने से निचले इलाकों में अचानक बाढ़ आ गई। कई घरों में मलबा भर गया और लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। खराब मौसम को देखते हुए डोडा और किश्तवाड़ जिले के अधिकांश क्षेत्रों में बुधवार को स्कूल बंद रखे गए।
प्रशासन ने विद्यार्थियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ऑनलाइन कक्षाएं संचालित करने के निर्देश दिए हैं। कठुआ के हीरानगर सब-डिवीजन के गांव सोहल में भारी बारिश से एक पोल्ट्री फार्म को बड़ा नुकसान हुआ। फार्म के पास स्थित पुलिया क्षतिग्रस्त होने से पानी का बहाव सीधे फार्म में पहुंच गया। इससे करीब 3,300 मुर्गियों में से 1,300 से अधिक पानी में डूबकर मर गई। बनी और मल्हार के अलावा बिलावर में भी संवेदनशील क्षेत्रों में एहतियातन स्कूल बंद रखे गए।
सांबा के गांव गौरन में बाढ़ जैसी स्थिति बन गई। उधर, राजोरी जिले में हाल में आई अचानक बाढ़ से बिजली और पेयजल आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हुई है। कई घरों में पानी घुस गया। जल शक्ति विभाग के अधिशासी अभियंता जुल्फकार अली के अनुसार बाढ़ से कुएं, पंप वेल और बोरवेल सहित कई जल स्रोत क्षतिग्रस्त हुए हैं। जम्मू के मल्होत्रा मोहल्ले में एक पुरानी इमारत की दीवार गिर गई।
सांबा में सबसे अधिक 87 मिमी
श्रीनगर मौसम विज्ञान केंद्र के अनुसार पिछले 24 घंटे में सबसे अधिक 87.0 मिमी बारिश सांबा में दर्ज की गई। कटड़ा में 71.2 मिमी, उधमपुर में 65.0 मिमी और जम्मू में 52.0 मिमी वर्षा हुई। कई स्थानों पर जलभराव की स्थिति बनी रही। जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय हाईवे वाहनों के लिए खुला रहा। कश्मीर घाटी के ऊपरी क्षेत्रों में तेज बारिश, जबकि श्रीनगर समेत मैदानी क्षेत्रों में रुक रुक कर वर्षा होती रही।
छह दिन भारी बारिश व भूस्खलन की चेतावनी
श्रीनगर मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक डॉ. मुख्तार अहमद ने बताया कि अगले छह दिन जम्मू संभाग के कई जिलों में भारी बारिश के आसार हैं। इस दौरान गरज के साथ बारिश और 30 से 40 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चल सकती हैं। उधमपुर, रियासी और डोडा में बादल फटने की आशंका है। संवेदनशील इलाकों में बाढ़, भूस्खलन, पहाड़ों से पत्थर गिरने और मलबा धंसने का खतरा भी बना हुआ है। 30 और 31 जुलाई को कश्मीर के अधिकांश हिस्सों में हल्की से मध्यम बारिश का पूर्वानुमान है। विभाग ने स्थानीय लोगों व पर्यटकों से मौसम की ताजा जानकारी लेते रहने और प्रशासन की सलाह का पालन करने की अपील की है।
भूस्खलन-ग्लेशियर झीलें फटने के खतरे के बावजूद प्रदेश एनडीएमएफ से बाहर
कठुआ से किश्तवाड़ और रामबन से उड़ी तक हर वर्ष भूस्खलन व ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों के फटने (जीएलओएफ) का खतरा बना रहता है। इसके बावजूद केंद्र ने प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने के उद्देश्य से चल रही दो प्रमुख राष्ट्रीय शमन परियोजनाओं (एनडीएमएफ) में जम्मू-कश्मीर को शामिल नहीं किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रदेश में आपदा जोखिम प्रबंधन की दीर्घकालिक तैयारियों पर असर पड़ सकता है।
लोकसभा में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के लिखित उत्तर के अनुसार, राष्ट्रीय लैंडस्लाइड जोखिम शमन परियोजना 15 राज्यों में लागू है। इनमें हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, त्रिपुरा, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।
इसी प्रकार राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) जोखिम शमन कार्यक्रम सिर्फ हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में संचालित है। हिमालयी क्षेत्र होने, भूस्खलन व ग्लेशियर झीलों के बढ़ते खतरे के बावजूद जम्मू-कश्मीर को योजना में भी शामिल नहीं किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर का बड़ा हिस्सा भूस्खलन संभावित क्षेत्र में आता है।
मानसून व बर्फबारी के बाद हर वर्ष रामबन, डोडा, किश्तवाड़, राजोरी, पुंछ व कश्मीर के कई क्षेत्रों में भूस्खलन से सड़कें बंद हो जाती हैं और जनजीवन प्रभावित होता है। जलवायु परिवर्तन के कारण ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों के फटने का खतरा भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में प्रदेश का इन राष्ट्रीय शमन परियोजनाओं से बाहर रहना चिंता का विषय माना जा रहा है।
हाई रिस्क जोन को मिलनी चाहिए प्राथमिकता
जम्मू विश्वविद्यालय के भू-विज्ञान विभाग के प्रो. अवतार सिंह जसरोटिया ने कहा, जम्मू-कश्मीर व लद्दाख भी हिमाचल प्रदेश समेत
अन्य हिमालयी राज्यों की तरह उच्च जोखिम वाले क्षेत्र हैं। यहां भूस्खलन-ग्लेशियर झीलों के फटने की आशंका अधिक है। ऐसे में यहां राष्ट्रीय परियोजनाओं में शामिल करना चाहिए ताकि आपदा जोखिम कम करने के लिए आवश्यक वित्तीय सहायता और संसाधन उपलब्ध हो सकें। उन्होंने कहा कि इन योजनाओं से बाहर रहने के दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।
राहत टीमें तैनात, लेकिन शमन योजनाओं की जरूरत
केंद्र ने मानसून के दौरान राहत एवं बचाव कार्यों के लिए जम्मू-कश्मीर में 15 एनडीआरएफ टीमें तैनात की हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि आपदा के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। भविष्य में जोखिम कम करने के लिए दीर्घकालिक शमन परियोजनाओं में जम्मू-कश्मीर को भी शामिल करना आवश्यक है।