दोमाना (ब्यूरो)। बाबा जित्तो के देव स्थान झिड़ी में लगने वाले मेले पर झिड़ी स्थित बाबा जित्तो मंदिर के महंत शाम लाल गोसाईं बताते हैं कि छह दशक पहले बाबा जित्तो ने शहादत देकर अन्याय और जमींदारी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई थी। बाबा जित्तो कटड़ा के पास अघार गांव में रहते थे। वह मां वैष्णो देवी के परम भक्त थे और रोजाना मां के दर्शन को भवन जाते थे। मां ने उनकी भक्ति से खुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वह उनके घर में जन्म लेंगी। घर में बेटी के जन्म के बाद पत्नी चल बसी। बाबा जित्तो अपनी चाची जोजां के तानों से तंग आकर एक दिन अपना गांव छोड़ कर बेटी बुआ कौड़ी को लेकर झिड़ी कल्याणपुर में रूलो लोहार के पास आ गया। उस समय के घरोटा के राजा अजैव देव से उन्होंने जोतने के लिए जमीन मांगी। राजा ने वजीर बीर सिंह मेहता से जित्तो को जमीन देने को कहा। वजीर बीर सिंह ने बाबा को बंजर जमीन काश्त करने को दे दी और कहा कि वह जित्तो से एक चौथाई भाग लेगा। बाबा जित्तो ने बाबा के तालाब में कड़ी मेहनत के बाद जमीन को जोता और उस पर कनक उगाई। कटाई के बाद कनक का ढेर लगाया गया। जब कनक देखने बीर सिंह महता पहुंचा तो उसका दिल इतनी ज्यादा कनक देख कर बेईमान हो गया। उसने अपने आदमियों से सारी कनक बोरों में भरने के आदेश दिए। इस पर बाबा जित्तो ने उसे अपने वचन पर कायम रहने को कहा। जब बीर सिंह नहीं माना तो बाबा जित्तो हाथ में कटार लेकर कनक के ढेर पर चढ़ गया और कहा रुखी कनक नीं खायां महतेया दिना मास रलाई। कहते हैं बाबा के शहीद होते ही वहां पर इतना ज्यादा तूफान आया कि सारी कनक दूर-दूर तक चली गई। महंत शाम लाल गोसाईं का कहना था कि आज भी वे लोग जिन लोगों के पुरखों ने उस कनक से कोई भी दाना खाया है, आज उनकी संतानें भी इसका प्रायश्चित करने यात्रा करते हुए पहुंचती हैं। कहते हैं जिन पक्षियों ने भी उस समय दाना खाया था, आज पक्षी भी इस स्थान पर यात्रा करते हैं। सबसे ज्यादा लोग पंजाब से आते हैं, क्योंकि कानाचक्क झिड़ी पाकिस्तान सीमा के नजदीक पड़ता है। उस समय जो लोग पाकिस्तान सीमा के साथ रहते थे, विभाजन के बाद पंजाब में आकर बस गए।