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युवा अपनी ताकत पहचानें: प्रो.अग्रवाल

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मथुरा/जम्मू। जीएलए विश्वविद्यालय मथुरा के द्वितीय दीक्षांत समारोह का शनिवार को भव्य आयोजन किया गया। यहां गरिमामयी उपस्थिति में तालियों की गड़गड़ाहट के बीच 536 छात्र-छात्राओं नेे डिग्रियां हासिल कीं। विभिन्न कोर्सेज में 16 छात्र-छात्राओं को विशिष्ट प्रदर्शन के लिए गोल्ड और सिल्वर मेडल प्रदान किए गए।
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समारोह का शुभारंभ मुख्य अतिथि संघ लोक सेवा आयोग, नई दिल्ली के अध्यक्ष प्रो. डीपी अग्रवाल, कुलाधिपति नारायणदास अग्रवाल और कुलपति प्रो. दुर्ग सिंह चौहान ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इसके बाद जीएलए विश्वविद्यालय के शैक्षिक सत्र-2013 में बीबीए, बीसीए, एमएससी (बायोटेक), एमबीए, एमसीए, एमटेक (सीएस), एमटेक (आईसी), एमफार्मा (फार्मा केमिस्ट्री), एमफार्मा (फार्माक्लॉजी) के 536 छात्र-छात्राओं को कुलपति प्रो. दुर्ग सिंह चौहान ने डिग्रियां प्रदान की। इन्हीं कोर्स में विश्वविद्यालय में प्रथम दो स्थानों पर रहने वाले छात्र-छात्राओं को मुख्य अतिथि प्रो. डीपी अग्रवाल ने गोल्ड मेडल और सिल्वर मेडल प्रदान किए। कुलाधिपति नारायणदास अग्रवाल ने डिग्रियां हासिल करने वाले सभी छात्रों को दीक्षोपदेश दिया।
समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. डीपी अग्रवाल ने सबसे पहले छात्र-छात्राओं को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि ये भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली हैं जो स्वयं महान प्रेरणास्रोत और जगतगुरु हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में युद्ध के समय अर्जुन को गीता ज्ञान दिया था जोकि आज हम सभी के लिए गीतोपदेश के रूप में उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि दुनिया के सामने हमें अपने आप को कमजोर आंकने की आवश्यकता नहीं है। हमने सुपर कंप्यूटर बनाया है। दुनिया को वैज्ञानिक हम दे रहे हैं। उन्होंने वर्तमान युवा पीढ़ी से कहा कि खुद की ताकत पहचानिए। ज्यादातर युवा करियर का चुनाव मां-बाप के कहने पर या फिर अपने ग्रुप के हिसाब से तय करते हैं। ये सरासर गलत है। अपनी क्षमताओं की पहचान हमें खुद करनी होगी। उसी के आधार पर हमें करियर बनाना होगा। उन्होंने नकारात्मक सोच से हटते हुए पॉजिटिव सोच के साथ आगे बढ़ने की जरूरत बताई। प्रो. अग्रवाल ने कहा कि एक दशक के दौरान उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन हुआ है।
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प्राचीन भारत की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने अंक पद्धति की शुरुआत की और आर्यभट्ट ने शून्य पूरे विश्व को प्रदान किया। विश्व का पहला विवि तक्षशिला में 700 ईसा पूर्व में स्थापित हुआ।
नालंदा विवि की स्थापना ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में हुई। इसका भारत के लिए शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान रहा।कुलपति प्रो. दुर्ग सिंह चौहान ने विवि की प्रगति के साथ भविष्य की योजनाओं की जानकारी दी। अंत में धन्यवाद ज्ञापन उपकुलपति प्रो. आनंद मोहन अग्रवाल ने किया। इस अवसर पर प्रो. जय प्रकाश, प्रो. बीडी चौधरी, गोविन्द प्रसाद अग्रवाल, महेश चन्द्र अग्रवाल, राजेश गर्ग, नरेन्द्र अग्रवाल, सेक्रेटरी सोसायटी एवं कोषाध्यक्ष नीरज अग्रवाल, एग्जीक्यूटिव काउंसिल सदस्य विवेक अग्रवाल, रजिस्ट्रार एके सिंह के अलावा विभिन्न निदेशक, शिक्षाविद, शिक्षक और छात्र उपस्थित थे।
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