जम्मू। प्रदेश भाजपा ने 1953 में प्रजा परिषद आंदोलन और 2008 में बाबा अमरनाथ आंदोलन के शहीदों को सरकारी स्तर पर सम्मान नहीं मिलने का मुद्दा उठाया है। अगर महाराजा हरि सिंह के खिलाफ बगावत करने वाले को जम्मू कश्मीर में शहीदों का दर्जा प्राप्त है, तो जम्मू कश्मीर की देश से एकता और अखंडता को कायम रखने के लिए कुर्बान होने वाले लोगों को नेकां-कांग्रेेस सरकार शहीद क्यों नहीं मानती। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष जुगल किशोर शर्मा ने सुंदरबनी में प्रजा परिषद आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह मुद्दा उठाया।
जुगल किशोर शर्मा ने कहा कि रियासत के डोगरा शासकों और महाराजा की फौज के जनरल जोरावर सिंह जैसे वीर सैनिकों ने जम्मू कश्मीर की सीमाओं को चीन, गिलगित और बाल्टीस्तान तक पहुंचाया था। इसके बाद 1947 में हजारों पीओके और वेस्ट पाकिस्तान रिफ्यूजियों ने शहादतें दी। यह दौर थमा नहीं। 1953 में प्रजा परिषद आंदोलन में डोगरों ने कुर्बानियां और फिर 2008 में बाबा अमरनाथ आंदोलन में इस इतिहास को दोहराया। सुंदरबनी में एक विधान, एक निशान और एक प्रधान की मांग पर तिरंगा फहराते हुए शहादत का जाम पीने वाले कृष्ण दास, रामजी दास और बेली राम इसका प्रमाण है। जम्मू के सत्ता में बैठे कांग्रेसी और नेकां नेताओं से शहीद डोगरों के वंशजों और समाज को जवाब देना पड़ेगा कि क्यों शहीदों को सरकार ने सम्मान नहीं दिया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि महाराजा हरि सिंह ने जम्मू कश्मीर का विलय देश के साथ किया था। इसके बावजूद पंडित जवाहर लाल नेहरू से शेख अब्दुल्ला के साथ दोस्ती निभाते हुए जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा दिया। इसका खामियाजा अलगाववाद और आतंकवाद के रूप में आज तक स्थानीय अवाम भुगत रहा है।