करवाचौथ के चांद का दीदार करतीं आदर्श कालोनी निवासी विवाहिता।
- फोटो : reasi news
उधमपुर। करवाचौथ का पर्व जिले में पारंपरिक श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया। यह व्रत विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए रखा जाता है। महिलाओं ने तड़के उठकर सरगी खाकर व्रत की शुरुआत की और फिर पूरे दिन निर्जला उपवास रखा गया। व्रत का समापन रात को चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य देने के साथ हुआ।
करवाचौथ व्रत को लेकर महिलाओं में विशेष उत्साह देखा गया। महिलाओं ने तड़के उठकर सरगी खाई, जोकि सास द्वारा दी जाती है। सरगी में सूखे मेवे, फल, मिठाइयां और पानी शामिल होता है। इसके बाद महिलाएं पूरे दिन बिना कुछ खाए-पिए रहकर व्रत का पालन करती हैं। इस दिन महिलाओं का विशेष शृंगार भी देखने को मिलता है। वह नए कपड़े पहनती हैं, पारंपरिक गहने और चूड़ियां पहनती हैं तथा हाथों में मेहंदी रचाती हैं।
करवाचौथ का शृंगार सुहागिनों के लिए विशेष महत्व रखता है। लाल, गुलाबी और सुनहरे रंग के कपड़ों का चयन इस दिन अधिक किया जाता है। शाम के समय महिलाएं पूजा की थाली सजाती हैं और करवे में जल भरकर चंद्रमा को अर्घ्य देने की तैयारी करती हैं। जैसे ही चंद्रमा आकाश में दिखाई देता है, महिलाएं उसे छलनी से देखकर अपने पति का चेहरा देखती हैं और फिर उनके हाथों से पानी पीकर व्रत खोलती हैं। जिनके पति घर से दूर होते है वह भी मन में उनका ध्यान या उनकी फोटो को देखकर व्रत संपन्न करती है। करवाचौथ की पूजा में करवा, दीपक, फल, मिठाई, चूड़ियां, सिंदूर, मेहंदी और अन्य पूजन सामग्री का उपयोग किया जाता है। शाम के समय महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा की सजी थाली के साथ व्रत की कथा सुनती हैं, जिसमें करवा चौथ की पौराणिक मान्यता और कहानियां सुनाई जाती हैं। करवाचौथ का यह व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच के प्रेम, समर्पण और विश्वास का प्रतीक भी माना जाता है।