उधमपुर। प्रमुख सत्र न्यायाधीश की अदालत ने हत्या के मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आरोपी की जमानत याचिका को खारिज कर दिया।
आरोपी ने जमानत के लिए आवेदन किया था। इसमें पुलिस स्टेशन, उधमपुर में एफआईआर दर्ज है। आवेदक ने कई आधार पर जमानत के लिए तर्क दिया। इसमें कहा गया कि उस पर मुकदमा चल रहा है, उसका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और गिरफ्तारी के समय वह पोस्ट-ग्रेजुएशन कर रहा था। उसके माता-पिता बूढ़े और बीमार हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई और नहीं है। वह 11 जुलाई, 2020 से लगातार हिरासत में है, कुल मिलाकर पांच साल और तीन महीने से ज्यादा हो गए हैं। अभियोजन पक्ष का मामला झूठे बयानों पर आधारित है और सबूत बताते हैं कि वह इसमें शामिल नहीं था। गवाहों के बयान टोका (हथियार) की बरामदगी के बारे में अभियोजन पक्ष की टाइमलाइन से मेल नहीं खाते हैं।
अभियोजन पक्ष ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आवेदक एक गंभीर अपराध (हत्या) में शामिल है। पिछली जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी और सिर्फ पुराने तर्कों को फिर से पेश किया गया है। आवेदक के खुलासे के आधार पर एक टोका बरामद किया गया था, जो उसे अपराध से जोड़ता है। आरोपी को रिहा करने से गवाहों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है, खासकर एक मुख्य गवाह राधा देवी के मामले में। गवाहों के बयान आवेदक की भूमिका स्थापित करते हैं और वह दूसरे आरोपी मुनीश सिंह का भाई है।
अदालत ने तर्कों और संबंधित कानूनी सिद्धांतों पर विचार किया। गंभीर अपराधों में जमानत देने पर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का हवाला दिया, जिसमें आरोप की प्रकृति, सजा की गंभीरता और गवाहों को प्रभावित करने की संभावना पर विचार करने की जरूरत पर जोर दिया गया।
कोर्ट ने जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि अभियोजन पक्ष ने 52 में से 47 गवाहों की जांच कर ली है और बाकी गवाहों की गवाही अभी बाकी है। यह मानने के लिए उचित आधार है कि आवेदक ने अपराध किया है। गिरफ्तारी के समय और हथियार बरामदगी में विसंगतियां जमानत के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं। साजिश में आवेदक की भूमिका और अपराध की गंभीरता उसे जमानत के लायक नहीं बनाती है। मुकदमा एडवांस स्टेज पर है और उसे रिहा करने से निष्पक्ष कार्यवाही खतरे में पड़ सकती है।