जम्मू-कश्मीर का वह इलाका जो सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहता आया है, यह कभी अलगाववादी और राष्ट्रविरोधी तत्वों के धरना-प्रदर्शन, पत्थरबाजी का गढ़ माना जाता था। यहां के लोगों ने अपनी सांसों में लगातार तीन दशक तक गन, गोली...बारूद से निकलने वाला धुआं घुलने का दंश झेला है। कभी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए डा. मुरली मनोहर जोशी को लाल चौक पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। आज इसी लाल चौक पर तिरंगा शान से लहरा रहा है। विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रत्याशी भी यहां से मैदान में है। चुनावी माहौल की बात करें तो बुजुर्गों में 1987 के चुनाव का बदला लेने वाली प्रतिशोध की भावना धधक रही है...तो युवा सब कुछ बदल देने पर आमादा नजर आते हैं।
इस बार किसी का फरमान नहीं चलेगा...अपनी मर्जी से देंगे वोट
लाल चौक के सामने मेवा दुकानदार बशीर अहमद कहते हैं कि 1983 से यहां हूं। इन 40 सालों में सब कुछ देखा है। चुनाव का जिक्र करने पर वह किसी पार्टी की हार-जीत पर नहीं बोलना चाहते। लेकिन, जम्मू-कश्मीर की पूरी सियासत ऐसे बयां करते हैं, जैसे टेप रिकॉर्डर इतिहास दोहरा रहा हो। वह बड़ा आरोप लगाते हैं। कहते हैं, 1987 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने चुनावों में धांधली की गलती न की होती, तो यहां शायद आतंकवाद न होता। जीत कोई रहा था, पर जिता किसी और को दिया गया।
बशीर कहते हैं कि मो. युसुफ शाह भी 1987 का चुनाव लड़ रहा था। उसकी बड़ी बढ़त थी। उसके विरोधी एनसी के गुलाम मोहिउद्दीन शाह को बमुश्किल चार हजार वोट बताए जा रहे थे। नतीजे आए तो गुलाम मोहिउद्दीन चुनाव जीत गए। इसके बाद मो. युसुफ शाह ने सैयद सलाहुद्दीन के रूप में एक आतंकी सरगना बनने की राह चुन ली। पाकिस्तान की शह पर यहां आतंकवाद शुरू हो गया। उसकी सजा हम लोग भुगतते रहे हैं। बशीर कहते हैं कि जो पारंपरिक क्षेत्रीय दल हैं, उन्हें हम आजमा चुके हैं। ये वंशवाद की राजनीति चला रहे हैं। पहले शेख अब्दुल्ला...फिर फारुक...फिर उमर अब्दुल्ला और अब उनके दो बेटे।
इसी तरह..मुफ्ती मोहम्मद सईद..महबूबा मुफ्ती और अब इल्तिजा। ये लोग परिवार से बाहर के अच्छे लोगों को सियासत में आगे नहीं आने देना चाहते। वह कहते हैं कि कश्मीर के लोग काफी बुद्धिमान हैं। सब समझ गए हैं। अब किसी का फरमान यहां नहीं चलेगा। लोग चुनाव के दिन निकलेंगे। अपनी मर्जी से वोट देंगे।
कश्मीरियों के दिल में अटल
बशीर कहते हैं कि कश्मीर के लोगों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हमने अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता को खो दिया, जो कश्मीरियत, जम्हूरियत व इंसानियत के दायरे में रहकर कश्मीरियों के लिए बात करते थे। उनके दिल में कश्मीरियों के लिए अलग दर्द था। अटल जी ने सिर्फ कहा ही नहीं, करके भी दिखाया। वे लाहौर गए। खेल व फिल्म जगत की हस्तियों व शिक्षाविदों को लेकर गए। लेकिन, बदकिस्मती से उधर के लोगों ने साथ नहीं दिया।