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Kathua News: अब शोर शराबा नहीं, सोशल मीडिया बना प्रचार का सरताज

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कठुआ। चुनाव आयोग की सख्ती के बाद अब राजनीतिक पार्टियों ने अपने प्रचार के माध्यमों में बदलाव कर दिया है। कभी झंडी, पोस्टर, बैनर, वाल राइटिंग, पेंटिंग से पट जाने वाले शहर व गांव में अब इनकी मौजूदगी नाममात्र रह गई है। इसकी जगह अब सोशल मीडिया ने ले ली है। इससे पेंटिंग और अन्य कलाकाराें के कारोबार पर फर्क पड़ा है।
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हालात यह हैं कि जिन सोशल मीडिया प्लेट फार्म पर कभी सम सामयिक घटनाओं की खबरें दिखती थीं। अब वहां राजनीतिक दलों की बैठकें और चुनाव प्रचार भर गया है। विधानसभा चुनाव के आखिरी चरण में जिले में होने वाले मतदान के प्रचार थमने में एक सप्ताह ही बचा हुआ है लेकिन शहर और गांव के चौक-चौराहों पर न तो कोई पोस्टर, झंडे व बैनर दिखाई दे रहे हैं और न ही कानों को विचलित करने वाली लाउड स्पीकर की आवाजें। वहीं, चुनाव कारोबार से जुड़े लोगों पेंटर, वाल राइटिंग, पेंटिंग और झंडी-बैनर वालों के लिए मायूसी का सबब बनता जा रहा है।

डिजिटल क्रांति के आगे परंपरागत चुनाव माध्यम पड़ने लगे फीके

चुनावी खर्च को बचाने के लिए विभिन्न पार्टियों के प्रत्याशी परंपरागत चुनाव माध्यम को छोड़ डिजिटल प्रचार पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। वहीं, चुनाव प्रचार से जुडे लोगों का कहना है कि डिजिटल क्रांति के मौजूदा परिदृश्य में प्रत्येक व्यक्ति के पास एंड्राइड फोन की सुविधा होने के चलते राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशी सोशल मीडिया का इस्तेमाल पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। एक तो प्रत्येक प्रत्याशी ने खुद की कई सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर अपना अकाउंट बना रखा है, जिसका संचालन करने के लिए उनके पास एक प्रचार प्रसार टीम है। इसके सहारे वह अपनी छोटी से छोटी बात को भी सोशल मीडिया के माध्यम से हजारों सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों को टैग कर अपना मैसेज पहुंचा देते हैं।
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एक महीने तक चलने वाले चुनाव के दौरान दो लोगों की टीम एक विधानसभा क्षेत्र में पेंटिंग के माध्यम से 30 से 35 हजार तक का काम कर लेते थे। इसके बाद प्रत्येक टीम अपना खर्चा निकाल कर 15 से 20 हजार रुपये बचा लेती थी। मौजूदा समय में चुनाव आयोग की सख्ती और सोशल मीडिया प्लेटफार्म का उपयोग करने का चलन से तमाम राजनीतिक पार्टियों ने वाल पेंटिंग से किनारा कर लिया है। इससे चित्रकारी कलाकार की आजीविका पर फर्क पड़ा है।
-करण पेंटर कठुआ

चुनाव मतदाता को बढ़ावा देने को ध्यान पर रखकर मैंने तीन गीतों की कंपोजिशन बनाई थी लेकिन सोशल मीडिया के बढ़ते चलन से आज न तो कोई राजनीतिक पार्टी और न चुनाव आयोग ने स्थानीय गीतकारों से चुनाव संबंधी गानों की मांग की है। गायकों को चुनाव के दौरान गीतों की प्रमोशन और आर्थिक लाभ की जो अपेक्षा रहती थी, वह बदलते चुनावी परिदृश्य में सिमटती जा रही है।
- ज्योति शर्मा, गायक और संगीतकार कठुआ

न केवल गायक और संगीतकार को, बल्कि कला से जुड़े सभी कलाकारों को सोशल मीडिया के उद्घोष के साथ प्रमोशन तो मिला लेकिन स्थानीय स्तर पर कलाकारों के आजीविका चलाने वाले स्रोतों की कमी भी आई है। रही बात चुनाव के दौर की तो यह कलाकार स्थानीय स्तर पर होने वाली राजनीतिक पार्टियों की बैठकों और जलसों में बड़े नेता की अनुपस्थिति में दर्शकों को बांध कर रखते थे और उनका मनोरंजन करते थे। इससे उन्हें चुनाव के दौरान आमदनी का स्रोत मिला जाता था, जो सोशल मीडिया पर प्रचार के बढ़ते प्रचलन से समाप्त हो गया।
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-बंटी अलमस्त, मेल मिलाप आर्टिस्ट्स ग्रुप कठुआ
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