किसानों का आरोप, धान बेचने के लिए 12-12 दिन का करना पड़ रहा इंतजार
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। सरकारी धान खरीद केंद्रों में व्यवस्थाओं को सही करने के डीसी कठुआ के निर्देशों को ठेकेदार ठेंगा दिखा रहे हैं। वीरवार को भजवाल मंडी में विरोध पर उतरे किसानों और किसान संगठन के प्रतिनिधियों ने मंडी में व्यवस्थित लूट का आरोप लगाते हुए प्रदर्शन किया।
कहा कि निजी डीलरों को ही मंडियां अलाट कर दी गई हैं जहां फसल बेचने आ रहे किसानों को जमकर परेशान किया जा रहा है। यह विवश किया जा रहा है कि वे मंडियों से अपना अनाज उठा लें और निजी हाथों में बेचने को मजबूर हो जाएं। वीरवार को रावी दरिया स्थित भजवाल खरीद मंडी में पहुंचे किसान नेताओं ने कहा कि मंडियों में कृषि विभाग और एफसीआई की मिलीभगत से इसे लूट का बाजार बना दिया गया है। किसानों को लूटने के लिए डीसी के आदेश को भी ठेंगा दिखाया जा रहा है। प्रदर्शन में शामिल किसान धर्म सिंह ने आरोप लगाते हुए कहा कि मंडियों में जानबूझ कर अव्यवस्था फैलाई गई है ताकि किसान मजबूर होकर अपनी फसल काे प्राइवेट डीलर को औने-पौने दामों पर बेच दें, क्योंकि निजी डीलर ही मंडी के ठेकेदार बने हुए हैं।
वहीं रघुवीर सिंह ने रोष जताते हुए कहा कि जिला के सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाले क्षेत्र में खोली गई मंडी में न पर्याप्त मजदूरों की व्यवस्था है और न ही फसल को साफ करने के लिए पंखे मौजूद है। ऐसे में हर किसान को अपनी फसल बेचने के लिए पंद्रह-पंद्रह दिन यहां इंतजार करना पड़ रहा है। सुस्त गति से चलने वाली खरीद अगर इसी तरह से चली आने छह महीने में भी धान की खरीद पूरी हो पाना संभव नहीं है।
किसान सोहन लाल ने रोष जताते हुए कहा कि उन्हें खुद मंडी में धान को पहुंचाए 12 दिन हो चुके हैं। लेकिन उनके धान का तौल नहीं हुआ है। कभी कहा जाता है कि धान की सफाई करवाई जाए तो कभी नमी ज्यादा होने का बहाना बना दिया जाता है। सबसे अहम यह है कि इस मंडी में दिन के समय नहीं, रात के समय खरीद की जा रही है। आखिर इसका क्या कारण है। इसकी जांच की जानी चाहिए।
वहीं किसान नेता हरि सिंह कहा कि धान खरीद केंद्र की व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए न तो प्रशासन, न एफसीआई और न ही कृषि विभाग गंभीर है। मंडी में आज भी सौ से ज्यादा किसानों के धान की ढेरियां लगी हैं जबकि प्रतिदिन के तौल की बात की जाए तो चंद वे किसान जो मंडी ठेकेदार के अपने लोग होते हैं या फिर वे जो मंडी ठेकेदार की शर्तें मान लेते हैं। उनका धान ही खरीदा जा रहा है। अगर मंडियों में किसानों की सहूलियतों को बेहतर बनाने के प्रयास नहीं किए तो किसान संगठित होकर आंदोलन की राह अख्तियार करने को मजबूर होंगे।