हीरानगर। कितनी बड़ी विडंबना है कि जिनके पास अपना घर हो, भरा पूरा परिवार, अच्छे पड़ोसी हों और सोना उगलने वाली जमीन हो, उनको हर बार गोलाबारी होने पर खानाबदोशों की तरह से जिंदगी जीनी पड़े। यह सच्चाई हीरानगर सेक्टर के उन 22 गांवों के हर ग्रामीण की है, जो हर बार पाकिस्तान की तरफ से गोलाबारी शुरू होने पर सबसे पहले उसकी जद में आते हैं।
भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पिछले डेढ़ दशक में लगातार हालात ऐसे रहे हैं कि पाकिस्तान कब गोलाबारी शुरू कर दे और इसमें किसकी जिंदगी चली जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता है। हीरानगर सेक्टर में पाकिस्तान की गोलाबारी के सबसे ज्यादा शिकार सीमा से सटे 22 गांवों के ग्रामीणों को भुगतना पड़ता है। गोलाबारी होने पर घर छोड़ना जैसी उनकी नियति बन गई है। गोलाबारी महज लोगों से उनके गांव ही नहीं छुड़वाती, बच्चों के स्कूल छूट जाते हैं, शादियां रुक जाती हैं और त्योहार मातम में बदल जाते हैं। जिनके घरों में कोई बीमार है या गर्भवती महिला है, उसे लेकर राहत शिविरों में रहना पड़ता है। गोलाबारी के जख्म और उससे मिलने वाले दर्द की अंतहीन कथा है, लेकिन हमारी सरकार इसे अपने कानों तक नहीं पहुंचने देती है।
हर बार पाकिस्तानी गोलाबारी के बाद हमारी सरकार सीमावर्ती ग्रामीणों को सुरक्षा देने के वादे करती है, जो कभी पूरे नहीं होते हैं। इस समय जमीनी सच्चाई यह है कि हीरानगर सेक्टर के लोगों में पूर्ववर्ती सरकारों के प्रति जितना रोष था, उससे कहीं ज्यादा केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार और राज्य की भाजपा-पीडीपी सरकार के प्रति है। अजीत कुमार, रमेश कुमार व नरेंद्र सिंह ने बताया कि इस बार भाजपा और खासकर नरेंद्र मोदी ने जिस तरह सीमावर्ती लोगों की सुरक्षा के सपने दिखाए, उसके चलते सीमावर्ती ग्रामीणों ने उन्हें खुल कर वोट दिए थे। लेकिन, चार साल बीतने के बाद भी न तो बंकर मिले हैं और न सुरक्षित स्थानों पर प्लाट ही मिले। पिछली सरकारों ने भी वादाखिलाफी ही की, लेकिन कम से कम वे इतनी बड़ी-बड़ी बातें तो नहीं करती थीं।
हीरानगर सेक्टर के लोगों में वर्तमान मोदी सरकार के प्रति भयंकर गुस्सा है। वे कहते हैं इस सरकार ने न तो बंकर बनवाने के अपने वादे को निभाया और न ही सुरक्षित स्थानों पर पांच-पांच मरले के प्लाट ही दिलाए। अंदरखाने उनको डर है कि यदि सुरक्षित स्थानों पर सीमावर्ती ग्रामीणों को प्लाट मिल गए तो गांव खाली हो जाएंगे। सीमावर्ती ग्रामीण अजीत कुमार कहते हैं यह सरकार अपनी तरह हम सीमावर्ती ग्रामीणों को कायर नहीं समझे। सीमावर्ती लोग इतने बुजदिल नहीं कि गांव छोड़कर चले जाएंगे। हम अपने गांव कभी नहीं छोड़ेगे। प्लाट की मांग इसलिए की गई थी कि इससे गोलाबारी के समय परिवार को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट किया जा सकता था। ऐसा नहीं होने से लोग घुट-घुट कर घरों में ही जीने को मजबूर होते हैं और बस घड़ियां गिनते हैं। यही दुआ करते हैं कि अगला मोर्टार उनके घर पर आकर न गिरे।