कठुआ। दियालाचक के गांव बन्नूचक में श्रीमद्भागवत कथा जारी है। बुधवार को कथा के दूसरे दिन कथाव्यास संत सुभाष शास्त्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को शांति की प्राप्ति के लिए सत्संग का लाभ लेने के लिए कहा।
उन्हाेंने कहा कि अक्सर लोग आत्मिक शांति के लिए दर-दर भटकते हैं लेकिन वह उन्हें नहीं मिल पाती। इसका कारण सही मार्ग दिखाने वाले के पास नहीं पहुंच पाना है। जिनके पास लोग पहुंचते हैं, वे स्वयं सत्य और प्रभु के विषय में समझाने की अपेक्षा में ऐसे विषयों में उलझा देते हैं कि साधक को शांति मिलने के बजाय उसके दुखों में इजाफा हो जाता है। उन्होंने कहा कि आत्मिक शांति के लिए आवश्यक है हमारे विचारों में सात्विकता का समावेश हो। हम जितने ही जटिलताओं से दूर रहेंगे, उतना ही इस समय का सदुपयोग हम मानव कल्याण के लिए और स्वयं के विकास के लिए कर सकते हैं। इससे स्थायी रूप से हम सुख समृद्धि और आत्मिक शांति अर्जित कर सकते हैं।
संत सुभाष शास्त्री ने कहा कि जब हमारा मन शांत होगा और हम सभी तरह से संतुष्ट होंगे, तभी हमारे मस्तिष्क में विकास के विचार उत्पन्न होंगे। गति से जीवन में स्थिरता नहीं, अपितु आत्मबल का निर्माण होता है। उन्होंने समझाया कि त्याग निस्वार्थ होता है। इसके पीछे कोई सोच विचार या हानि लाभ का गणित नहीं होता है। इसके विपरीत दूसरों की देखादेखी से जो त्याग किया जाता है, उससे आंतरिक शांति की प्राप्ति नहीं होती है, इसलिए त्याग प्रतिस्पर्धा की भाव से न करें क्योंकि इससे सुख के बजाय दुख मिलता है। जब तक मनुष्य के मन में भागवत भावना होने के बजाय भौतिकता की ओर झुकाव व लगाव होता है, तब तक मन में तनाव पैदा होता रहेगा। ऐसे तनाव से बचने का एकमात्र साधन सत्संग है, जो हमें गुरु की शरण में आने से ही मिल सकता है।