अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद बदले हालात में संसद, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की घोषणा के बावजूद जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा नहीं मिल पाया है। वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन के बाद राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। प्रदेश में छह साल से विधानसभा चुनाव भी नहीं हो पाए हैं। लाखों विस्थापित कश्मीरी पंडितों को भी घाटी में वापसी का इंतजार है।
जम्मू-कश्मीर में अंतिम बार विधानसभा चुनाव 2014 में हुए थे। प्रदेश में सत्ता संभालने वाली पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार जून 2018 में गिर गई। इसके बाद से कोई निर्वाचित सरकार नहीं है। उप राज्यपाल के हाथ में शासन-प्रशासन की डोर है। विपक्षी राजनीतिक दल प्रदेश में जल्द विधानसभा चुनाव कराने और जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रमण भल्ला का कहना है कि सदन से लेकर प्रधानमंत्री द्वारा घोषणा के बाद भी राज्य का दर्जा न देकर भाजपा ने जम्मू कश्मीर के लोगों से धोखा किया है। विधानसभा चुनाव पर भी संदेह है।
कश्मीरी पंडितों को घाटी में वापसी न होने का मलाल
घाटी में सम्मानजनक वापसी न होने पर विस्थापित कश्मीरी पंडितों में मलाल है। जगती टेनमेंट कमेटी के प्रधान शादी लाल पंडिता का कहना है कि कश्मीर में प्रत्येक विस्थापित कश्मीरी पंडित परिवार की कम से कम पचास कनाल से अधिक जमीन है, इन पर कब्जे हो चुके हैं। सरकार विस्थापितों के पुनर्वास के लिए कुछ खास नहीं कर पाई है। सरकार को प्रत्येक विस्थापित कश्मीरी पंडित परिवार की राहत राशि बढ़ाकर 25000 रुपये करनी चाहिए।
कश्मीरी पंडित अश्विनी चिरंगू ने कहा कि प्रधानमंत्री विशेष नौकरी पैकेज के तहत विस्थापित कर्मियों के लिए कुछ क्वार्टर कश्मीर में बनाए गए थे, लेकिन बाकी कुछ नहीं हो पाया है। हम कश्मीर में होम लैंड की मांग करते रहे हैं। अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद विस्थापित कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में सम्मानजनक वापसी की उम्मीद जगी थी।
लेकिन इस दिशा में अभी तक कुछ खास नहीं हो पाया है। 1990 में कश्मीर से एक लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों को पलायन करना पड़ा था। भाजपा सरकार ने 2011 में अपने एजेंडे में कश्मीरी पंडितों का कश्मीर में सम्मानजनक पुनर्वास को शामिल किया था। पूर्व सरकारों की ओर से 2008 और 2015 में कश्मीरी विस्थापितों के घाटी लौटने और पुनर्वास की नीति तय की गई। पैतृक घरों में लौटने के लिए प्रोत्साहन की घोषणा की गई। इससे पहले वर्ष 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घाटी में पंडितों के पुनर्वास के लिए एक विशेष नौकरी पैकेज की घोषणा की थी।