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Politics: राजस्थान में राजनीतिक संकट का जिम्मेदार कौन? कहीं माकन के लिए गहलोत की कुर्बानी तो नहीं हो रही

Tue, 27 Sep 2022 05:46 PM IST
अरविंद कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

राजस्थान में सियासी संकट के लिए अजय माकन ही जिम्मेदार, ये बयान है राजस्थान के कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस के विश्वसनीय नेता शांति धारीवाल का है। इनके घर चली विधायकों की बैठक के बाद प्रदेश में सियासी संकट शुरू हुआ।
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अशोक गहलोत और अजय माकन - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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राजस्थान कांग्रेस में जो घटनाक्रम घटित हुआ, इसके लिए प्रभारी महासचिव अजय माकन जिम्मेदार हैं। उन्होंने विधायकों की राय जाने बिना, जबरन ऐसा मुख्यमंत्री थोपने की कोशिश कर रहे थे, जिसके नाम पर विधायकों में अंदरूनी नाराजगी थी। प्रभारी महासचिव की भूमिका में माकन असफल साबित हुए।

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प्रभारी महासचिव होने के नाते अजय माकन की यह जिम्मेदारी थी कि वे विधायक और पार्टी के बड़े नेताओं से बात करते। विधायकों की नब्ज टटोलने के बजाय, वे कई घंटे पांच सितारा होटल में ही मस्त रहे। चूंकि, मल्लिकाजुर्न खड़गे पहली दफा पर्यवेक्षक के तौर पर जयपुर आए थे। उनको राजस्थान की राजनीति और कांग्रेसी विधायकों के मिजाज के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। लेकिन माकन दर्जनों बार राजस्थान आ चुके हैं, यहां की राजनीतिक आबोहवा से पूरी तरह वाकिफ हैं।

सूत्र क्या कह रहे...
सूत्रों की माने तो राजस्थान में तुरंत सीएम बदलने का सुझाव अजय माकन का था। उन्होंने सोनिया से मुलाकात कर इस बात के लिए राजी कर लिया कि गहलोत के स्थान पर सचिन पायलट को सीएम बनाने में कतई देरी नहीं करनी चाहिए। आनन-फानन में माकन और खड़गे को पर्यवेक्षक नियुक्त कर उन्हें जयपुर भेजा गया। सबसे बड़ी गलती यही हुई। आने से पहले इन दोनों पर्यवेक्षकों ने गहलोत को भी विश्वास में नहीं लिया और नया सीएम थोपने के लिए मेहमानों की तरह जयपुर आ धमके।
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प्रभारी होने के नाते माकन को बखूबी पता था कि गहलोत और पायलट के रिश्तों में खटास है। जब उन्हें पता था तो उन्होंने गहलोत को ओवरटेक कर पायलट को सीएम बनाने में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई? गहलोत जब सीएम पद छोड़ने के लिए राजी हो गए थे। ऐसे में दिल्ली से एकाएक पर्यवेक्षक भेजना विधायकों का सरासर अपमान था। माकन को यह भी पता है कि गहलोत सीएम पद के लिए पायलट के नाम पर सहमत नहीं हैं तो उन्होंने आलाकमान को अंधेरे में क्यों रखा?

क्यों आक्रोशित हुए विधायक...
जिस अंदाज में दोनों पर्यवेक्षक फैसला लेने के लिए जयपुर आए थे, इससे विधायकों के साथ साथ गहलोत का आक्रोशित होना स्वभाविक था। गहलोत शुरू से ही नहीं चाहते थे कि उनके स्थान पर पायलट कुर्सी पर काबिज हों। लेकिन इसके बावजूद आलाकमान के नाम पर पायलट को थोपने की कोशिश की तो गहलोत ने दिखा दिया कि उनकी इच्छा के बिना राजस्थान में पत्ता भी नहीं हिल सकता।

माकन की बचकाना हरकतों की वजह से गहलोत, पायलट और आलाकमान के साथ-साथ पूरी पार्टी की जबरदस्त किरकिरी हुई। हालांकि, रायता काफी फैल चुका है। फिर भी आपसी सहमति से इस मामले को निपटाया जा सकता है। यह तो अब तय हो ही गया है कि कांग्रेसी विधायकों को सीएम के रूप में पायलट स्वीकार नहीं हैं। गहलोत इस पद पर बने नहीं रहना चाहते। ऐसे में किसी अन्य अनुभवी और बुजुर्ग विधायक को सीएम बनाकर कांग्रेस अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा दोबारा पा सकती हैं। अनुशासनहीनता का चाबुक दिखाकर विधायकों को डराया और धमकाया नहीं जा सकता।

सोनिया और माकन की मुलाकात...
सोनिया गांधी से मिलने के बाद अजय माकन ने प्रेस से बातचीत में कहा, लिखित रिपोर्ट भी सोनिया गांधी को देनी है। दूसरी तरफ अशोक गहलोत सदियों से कांग्रेस और गांधी परिवार के वफादार रहे हैं। मोदी के खिलाफ अगर कोई खड़ा रह सका तो वो अशोक गहलोत ही हैं। आज की परिस्थितियों में कांग्रेस पार्टी अशोक गहलोत के स्थान पर क्या अजय माकन को अहमियत देगी, जो सिर्फ आलाकमान की इच्छा से राजनीति में जीवित हैं।

निरंतर अशोक गहलोत और राजस्थान पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात कही जा रही है। साथ ही कुछ विधायकों के सचिन पायलट के साथ आने की भी बात समाने आई है, जो राजस्थान में कांग्रेस की सरकार को अस्थिरता में डाल रही है। आज भी सबके जाने के बाद भी गहलोत के पास 60 से 70 ऐसे विधायकों का समर्थन है, जो गहलोत के लिए कुछ भी खेल रच सकते हैं। ऐसे में अगर ऐसा कुछ होता है तो राजस्थान में कांग्रेस की सरकार का जाना तय है। अब क्या कांग्रेस और सचिन पायलट बीजेपी के पास जाकर समर्थन की मांग करेंगे और सरकार बचाएंगे। ये तो वक्त ही बताएगा।

राजस्थान का ये संकट जबरदस्ती कागजों के नाम पर खींचा जा रहा है, जिसकी वजह से राजस्थान मध्यअवधि चुनाव के मुहाने पर खड़ा है। अगर ऐसा होता है तो अशोक गहलोत और समर्थकों के लिए कई दरवाजे खुल सकते हैं। गहलोत वो नेता हैं, जिसके लिए कोई भी लालायित है। प्रदेश में उत्पन संकट और कांग्रेस को एक पुरजोर नेता से वंचित करने का पूरा श्रेय प्रभारी अजय माकन को जाता है। कांग्रेस आलाकमान अब एक कागजी नेता को चुनता है या फिर जन नेता को, ये जल्द ही साफ हो जाएगा।

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