प्रदेश में शादी के सावे शुरू होते ही गांव—ढाणियों में बाल विवाह की खबरें भी सुनने को मिल रही हैं। हम आपको ऐसी बेटियों से मिलवाते हैं जिन्होंने बाल विवाह के दंश को झेला और उस दलदल से बाहर निकलकर एक दिन की मंत्री भी बनी।
दरअसल, राजस्थान के राजसमंद के बागोल की रहने वाली जसोदा गमेती की शादी उसके परिजनों ने छह साल की उम्र में ही कर दी थी। छोटी उम्र में शादी होने के बाद जैसे ही जसोदा पन्द्रह साल की हुई, उसे ससुराल में भेज दिया गया। उसने बताया कि इसके लिए उसे कहा गया कि कुछ समय वहां रह आओ और फिर वापस आ जाना। ऐसे आए दिन चलने के बाद जसोदा इस रूटीन से तंग आ गई। सुसराल आने के बाद से उसने आए दिन पति और ससुराल वालों के ताने सुनकर इस दलदल से बाहर निकलने का फैसला किया।
अब तो केवल उसका एक ही मकसद था कि कैसे भी हो उसे इस बाल विवाह के दंश को और नहीं झेलना। इसी दौरान उसकी मुलाकात महिला मंच की सदस्यों से हुई। जसोदा ने अपनी आपबीती मंच की सदस्यों को बताई, जिसके बाद से उसे अपनी नई जिंदगी को शुरुआत करने की प्रेरणा मिली। वजेराम गमेती की इस बेटी ने जाति के पंचों से लड़कर, फिर पति और ससुराल वालों का विरोध करके अपनी बचपन की शादी को गलत करार दिलवाया। इसके बाद जैसे ही जसोदा बालिग हुई उसने इस सम्बंध में न्यायालय में परिवाद दायर किया, जहां से कानूनन उसके बाल विवाह को निषेध घोषित किया गया।
इस बेटी के इसी साहस को देखते हुए प्रदेश के महिला एवं बाल विकास मंत्री अनिदा भदेल ने उसे अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के मौके पर एक दिन का मंत्री बनाया। आज ये जसोदा बाल विवाह के बंधन में बंधने जा रही सभी लड़कियों के लिए प्रेरणा बनी हुई है।