सीकर में एक गांव ऐसा है, जिसके अधिकतर लोग रोज श्मशान जाते हैं, कुछ देर वहां बिताते हैं और घर लौट आते हैं। लोग कहते हैं कि वहां उन्हें अलग तरह का सुकून मिलता है।
दरअसल वे इस श्मशान में सुबह और शाम को सैर करने जाते हैं। गांव में कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां वे हरियाली के बीच धूम सकें। ऐसे में गांव के लोगों ने मिलजुलकर श्मशान को ही गार्डन की सूरत दे दी। अब ये मोक्षधाम कम और गार्डन ज्यादा लगता है। यहां दिन में जहां लोग दाह संस्कार के लिए आते हैं, वहीं अलसुबह सैर करने और सेहत बनाने आने वालों की भी कमी नहीं रहती। इस पूरी मुहिम को एक रिटायर्ड फौजी ने शुरू किया था। आठ साल लग गए उसे बदलने में, लेकिन अब ये श्मशान किसी चमन सा सूकुन देता है।
ये किस्सा सीकर के कंवरपुरा का है। गांव में सर्व समाज का मोक्षधान है। ऐसा मोक्ष धाम जहां लोग दाह संस्कार के लिए कभी कभी आएं पर धूमने के लिहाज से रोज सुबह शाम आते हैं। यहां हरियाली लोगों को अपने आप खींच लाती है। करीब आठ सौ छायादार पेड़ है।
आठ साल पहले गांव में रहने वाले रिटायर्ड फौजी जगनसिंह व गिरधारी बिजारणियां ने मोक्षधान को हरा भरा बनाने का सपना देखा। उन्होंने अपनी कोशिश शुरू की तो उनके साथ गांव के ही रहने वाले लोग जुड़ने लगे। लोग सुबह शाम श्रमदान करने आते। देखते ही देखते श्मशान गार्डन की सूरत लेने लगा। लोगों ने मिलकर ही वहां एक चौबारा भी बना दिया। श्रमदान का ये सिलसिला बदस्तूर अब भी जारी है।