याचिका में बताया गया कि पीजी की गाइड लाइन के अनुसार एक पीजी पाठ्यक्रम एक सीट-एक फेकल्टी अनुपात में चलता है। ऐसे में राज्य सरकार का यह कोर्स पीजी गाइड लाइन के भी विपरीत है। वहीं कोर्स में प्रवेश के लिए किसी तरह की प्रवेश परीक्षा भी नहीं ली गई।
याचिका में यह भी कहा गया कि एक साल का कोर्स करने वाले चिकित्सकों को पीजी कर चुके चिकित्सकों के समान रेडियोलॉजी और एनेस्थिसिया जैसा महत्वपूर्ण काम कराने का भी प्रावधान किया गया। जबकि इस कार्य के लिए पीजी कर रहे चिकित्सक को तीन साल का जटिल अध्ययन करना पड़ता है। वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि ग्रामीण चिकित्सकों की स्किल बढ़ाने के लिए यह कोर्स लागू किया गया है।
जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने कोर्स को मरीजों के लिए खतरा बताते हुए इसे रद्द कर दिया है।