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राजस्थान दिवस विशेष: तो पाकिस्तान में होता आधा राजस्थान

अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर Updated Thu, 30 Mar 2017 08:34 PM IST
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राजस्थान 1947 - फोटो : amar ujala

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आज राजस्थान अपना 68वां स्थापना दिवस मना रहा है। अपनी दिलचस्प लोक कला और संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। राजस्थान, समृद्ध संस्कृति के साथ-साथ हैरतंगेज अतीत, खासतौर पर यहां के राजा-महाराजाओं के रोचक किस्सों के लिए जाना जाता है।

इसके अतीत की कहानी जानने से पहले यह जान लेना भी जरूरी है कि फिलहाल भौगोलिक तौर पर यह देश (देश के कुल क्षेत्रफल का 10.41 फीसदी) का सबसे बड़ा प्रदेश (342,239 वर्ग किमी) है। जनसंख्या के लिहाज से 2011 की जनगणना के मुताबिक (68,621,012) यहां देश के तकरीबन 5.67 फीसदी लोग रहते हैं। राजस्थान का अतीत दुनिया की सबसे पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता के निशान समेटे हुए है। यकीनन इसे सभ्यताओं का पालना कहा जा सकता है जहां सभ्यता और संस्कृति का अविरल प्रवाह जारी है।


हनुमानगढ़ जिले में घग्गर-हकरा नदी के किनारे मौजूद कालीबंगा उस अतीत की कहानी बयां करता है जब पूरी दुनिया आदिम जीवन जी रही थी और यहां उन्नत सभ्यता और संस्कृति मौजूद थी। बहरहाल, प्राचीन काल के बाद राजस्थान को अब इसके राजसी शानो-शौकत के लिए जाना जाता है।

भारत में विलय की कहानी

30 मार्च, 1949 को राजस्थान भारत गणराज्य का हिस्सा बना। राजा-रजवाड़ों के किस्सों की ही तरह राजस्थान का भारत में विलय भी दिलचस्प कहानी की तरह है। 1947 में जब देश आजाद हुआ था तो मुगल और अंग्रेजों की शासन पर पकड़ खत्म हो चुकी थी और देशी रियासतों ने फिर से ताकत जुटाना शुरू कर दिया था।

मौजूदा राजस्थान के भौगोलिक क्षेत्र के लिहाज से देखें तो आजादी के वक्‍त राजस्थान में 22 रियासतें थीं जिनमें से केवल अजमेर (मेरवाड़ा) ब्रिटिश शासन के कब्‍जे में था बाकी 21 रियासतें स्थानीय शासकों के अधीन थीं। ब्रिटिश सरकार से भारत के आजाद होते ही अजमेर रियासत भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के करारों के मुताबिक खुद-ब-खुद भारत का हिस्सा बन गई।

शेष 21 रिसासतों में से ज्यादातर राजा खुद को स्वतंत्र राज्य बनाने की मांग कर रहे थे। राजाओं का कहना था कि उन्होंने आजादी के लिए संघर्ष किया है और उन्हें शासन चलाने का अच्छा तजुर्बा भी है इसलिए उनके राज्यों को स्वतंत्र राज्य के तौर पर भारत में शामिल किया जाए और शासन उनके ही अधीन बना रहने दिया जाए।

18 मार्च, 1948 को सरदार वल्‍लभ भाई पटेल और उनके सचिव वी.पी. मेनन ने एकीकृत राजस्थान के लिए अलग-अलग राजाओं को भारत में शामिल होने की प्रक्रिया के लिए राजी करने की कोशिशें शुरू कीं और नवंबर 1956 में मौजूदा राजस्थान बना।
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पाकिस्तान के साथ जाना चाहती थी जोधपुर रियासत 

(गोले में) 1951 में नई दिल्ली में भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से मुलाकात करते हुए जोधपुर के पूर्व शासक महाराजा हनवंत सिंह - फोटो : Internet
मोहम्मद अली जिन्ना जोधपुर (मारवाड़) को भी पाकिस्तान में मिलाना चाहता था, वहीं जोधपुर के शासक हनवंत सिंह कांग्रेस के विरोध और अपनी सत्ता स्वतंत्र अस्तित्व की महत्वाकांक्षा में पाकिस्तान में शामिल होना चाहते थे। अगस्त 1947 में हनवंत सिंह धौलपुर के महाराजा तथा भोपाल के नवाब की मदद से जिन्ना से मिले।

हनवंत सिंह की जिन्ना से बंदरगाह की सुविधा, रेलवे का अधिकार, अनाज तथा शस्रों के आयात आदि के विषय में बातचीत हुई। जिन्ना ने उन्हे हर तरह की शर्तों को पूरा करने का आश्वासन दिया। भोपाल के नवाब के प्रभाव में आकर हनवंत सिंह ने उदयपुर के महाराणा से भी पाकिस्तान में सम्मिलित होने का आग्रह किया। लेकिन उदयपुर ने हनवंत सिंह के प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि एक हिंदू शासक हिंदू रियासत के साथ मुसलमानों के देश में शामिल नहीं होगा।

हनवन्तसिंह को भी इस बात ने प्रभावित किया और पाकिस्तान में मिलने के सवाल पर फिर से सोचने को मजबूर कर दिया। पाकिस्तान में मिलने के मुद्दे पर जोधपुर का माहौल तनावपूर्ण हो चुका था। जोधपुर के ज्यादातर जागीरदार और जनता पाकिस्तान में शामिल होने के खिलाफ थे। माउन्टबेटन ने भी हनवंत सिंह को समझाया कि धर्म के आधार पर बंटे देश में मुस्लिम रियासत न होते हुए भी पाकिस्तान में मिलने के उनके फैसले से सांप्रदायिक भावनाएं भड़क सकती हैं। वहीं सरदार पटेल किसी भी कीमत पर जोधपुर को पाकिस्तान में मिलते हुए नहीं देखना चाहते थे।

इसके लिए सरदार पटेल ने जोधपुर के महाराज को आश्‍वासन दिया कि भारत में उन्हें वे सभी सुविधाएं दी जाएंगी जिनकी मांग पाकिस्तान से की गई थी। जिसमें शस्रों का, अकालग्रस्त इलाकों में खाद्यानों की आपूर्ति, जोधपुर रेलवे लाइन का कच्छ तक विस्तार आदि शामिल था। हालांकि मारवाड़ के कुछ जागीरदार भारत में भी विलय के विरोधी थे। वे मारवाड़ को एक स्वतंत्र राज्य के रुप में देखना चाहते थे लेकिन महाराजा हनवन्त सिंह ने समय को पहचानते हुए भारत-संघ के विलयपत्र पर 1 अगस्त, 1949 को हस्ताक्षर किए।
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