राजस्थान में माता का एक मंदिर ऐसा भी है, जिसके सामने न केवल हिंदू राजा बल्कि दिल्ली की सल्तनत के मुगल बादशाह भी नतमस्तक हो गए थे। यूं तो माता का यह मंदिर भाई बहन के अटूट बंधन का प्रतीक है, वहीं इस मंदिर को तोड़ने की कोशिश करने वाले मुगल बादशाह औरंगजेब को नाको चने चबाने पड़े थे।
हम बात कर रहे हैं जीण माता की। यह मंदिर जयपुर से करीब 115 किमी दूर सीकर जिले में अरावली की पहाड़ियों पर स्थित है। कहा जाता है कि जीण का जन्म घांघू गांव के एक चौहान वंश के राजा घंघ के घर में हुआ था। उनका एक बड़ा भाई भी था हर्ष। जीण और हर्ष, दोनों भाई बहनों में अटूट प्यार था। जीण को शक्ति व हर्ष को भगवान शिव का रूप माना गया है। इन दोनों भाई बहन के बीच ऐसा अटूट बंधन था, जो हर्ष की शादी के बाद भी कमजोर नहीं हुआ।
कहा जाता है कि एक बार जीण अपनी भाभी के साथ पानी भरने सरोवर पर गई हुई थी। दोनों में इसी बात को लेकर पहले तो बहस हुई और फिर शर्त लग गई कि हर्ष सबसे ज्यादा किसे मानते हैं। हल ये निकला कि जिसके सिर पर रखा मटका हर्ष पहले उतारेगा, माना जाएगा कि उसे ही हर्ष सबसे प्यारा मानते हैं।
हर्ष ने सबसे पहले अपनी पत्नी के सिर पर रखा मटका उतारा। जीण शर्त हार गई। ऐसे में वो नाराज हो गई और अरावली के काजल शिखर पर नाराज हो कर जा बैठी और तपस्या करने लगी। हर्ष मनाने गया लेकिन जीण नहीं लौटी और भगवती की तपस्यी में लीन रही।
बहन को मनाने के लिए हर्ष भी भैरों की तपस्या में लीन हो गया। मान्यता है कि अब दोनों की तपस्या स्थली जीणमाता धाम और हर्षनाथ भैरव के रूप में जानी जाती है।
मंदिर नहीं तोड़ पाए औरंगजेब के सैनिक
जीण माता मंदिर में श्रद्धालु
- फोटो : अमर उजाला
इस मंदिर की महिमा की एक कहानी और है। कहा जाता है कि मुगल बादशाह औरंगजेब ने इन मंदिरों को तुड़वाने के लिए अपने सैनिकों को भेजा। मुगल सैनिकों को देखकर गांव वाले असहाय नजर आए।
उन्होंने मंदिर न तोड़ने की गुहार की, जब बात नहीं बनी तो गांव वालों ने माता के सामने अपनी गुहार लगाई। प्रार्थना के बाद जीण माता का प्रचार देखने को मिला। कहा जाता है कि माता का ईशारा हुआ और मंदिर तोड़ने के लिए सैनिकों पर मधुमक्खियों का झुंड टूट पड़ा।
घबराए औरंगजेब के सैनिक वहां से भाग खड़े हुए। इसके बाद से लोगों की श्रद्धा और भी ज्यादा हो गई।
तबीयत ठीक होते ही बढ़ गई थी आस्था
जीण माता
- फोटो : अमर उजाला
इसके बाद औरंगजेब भी गंभीर रूप से बीमार हो गया। मंदिरों पर हमले की अपने करतूत पर अफसोस जताते हुए माफी मांगने जीण मंदिर पहुंचा। यहां मांफी मांगी और माता को अखंड दीपक के लिए हर महीने सवा मण तेल भेंट करने का वचन दिया।
इसके बाद से औरंगजेब की तबीयत भी ठीक होने लगी थी। तभी से मुगल बादशाह की इस मंदिर में आस्था भी बन गई।